विषय:- वेदांत की सरल व्याख्या
“वेदांत” की मूलरूप
व्याख्या
सर्वप्रथम स्वामी विवेकानंद द्वारा वेदांत की
वैज्ञानिक व्याख्या पर प्रकाश डालने से पूर्व, मैं यहाँ वेदांत का सरल व्याख्यायित
रूप आप सभी के सामने यथामति प्रस्तुत करना चाहता हूँ।
सबसे पहले
हमें वेदांत सिद्धांतों का परिचय प्राप्त करना होगा और यह समझना होगा कि, ये
सिद्धांत किस प्रकार हिमालय की कंदराओं से लेकर भीड़भाड़ वाले आज के शहरों तक की
परंपरा में भी न केवल जीवित रहे अपितु अपने ज्ञान के आलोक से संपूर्ण मनुष्यजाति
को आलोकित करते रहे।
इन सिद्धांतों की मुख्य विशेषता यह है कि इनके
प्रणेता निर्जनवास करने वाले ऋषिगण न होकर वो राजा-राजर्षि हुए जिन्होंने सत्ता से
ही कर्मण्यता प्राप्त की।
छान्दोग्योपनिषद की इस कथा को उपरोक्त कथन के
प्रमाण स्वरूप लिया जा सकता है-
आरुणि ऋषि के पुत्र हुए श्वेतकेतु। ये ऋषि
सम्भवत: वानप्रस्थी थे। श्वेतकेतु का लालन पालन वन में ही हुआ। एक बार वे पांचालों
के नगर में गये और राजा प्रवाहण जैवली की राजसभा में उपस्थित हुए। राजा ने उनसे
पूछा,“मरते समय प्राण इस लोक से किस प्रकार गमन करता है, क्या यह जानते हो ?” श्वेतकेतु
ने कहा- “नहीं महाराज”, “किस प्रकार एवं किस कारण पुनर्जन्म होता है, यह जानते हो”
? श्वेतकेतु ने कहा- “नहीं महाराज”, “पितृयान” और “देवयान” के विषय में कुछ जानते
हो ? श्वेतकेतु ने कहा- “नहीं महाराज”। इस प्रकार राजा ने कई प्रश्न किये किन्तु
श्वेतकेतु किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दे सका। लौटकर उसने पिता से सब बातें बताईं।
तब ऋषि आरुणि ने कहा- “इन प्रश्नों के उत्तर मुझे
भी ज्ञात नहीं, यदि ज्ञात होते, तो तुम्हे भी सिखाता” । तब श्वेतकेतु ने राजा के
समक्ष उपस्थित होकर इस गुप्त विषय की शिक्षा देने की प्रार्थना की । तब राजा ने
कहा – “यह विद्या, यह ब्रह्म विद्या केवल राजाओं को ज्ञात थी , पुरोहितों को इसका
ज्ञान कभी नहीं था” ।
तत्पश्चात राजा ने कहा- “हे गौतम ! परलोक अग्नि
है, सूर्य ईंधन है, धूम्र किरणें हैं, दिन ज्वाला है, चन्द्रमा भस्म है, तारागण
चिंगारियाँ हैं और इस अग्नि में देवता श्रद्धा की आहुति देते हैं” । उसने आगे कहा
“ तुम्हारी इस क्षुद्र अग्नि में होम करने का कोई प्रयोजन नहीं, सम्पूर्ण जगत ही
यह अग्नि है और दिन रात उसमें होम हो रहा है । देवता, मनुष्य सभी निरंतर उसी की
उपासना कर रहे हैं । मनुष्य का शरीर ही अग्नि का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है”।
अब हम इसी कथा के आलोक में वेदान्त के आधार
दर्शन को सरल शब्दों में समझने का प्रयास करेंगे-
यदि हम वेदान्त की सरल परिभाषा लें तो यह कह सकते
हैं कि –
“वेदान्तो नाम-उपनिषत्
प्रमाणं तदुपकारिणि शारिरक–सूत्रादीनि च”
अर्थात “उपनिषद् रुपी प्रमाण को वेदान्त कहते
हैं और उसके सहायक ब्रह्मसूत्र आदि ग्रन्थ भी वेदान्त कहलाते हैं” ।
उपनिषदों को परिभाषित करने के लिए हमें यह जानना
होगा कि हमारे सम्पूर्ण वेद दो मुख्य भागो में वर्गीकृत किए जा सकते हैं ।
प्रथम भाग “कर्मकाण्ड” तथा द्वितीय भाग
“ज्ञानकाण्ड”-
कर्मकाण्ड के अन्तर्गत ब्राह्मणों के प्रख्यात
मन्त्र तथा अनुष्ठान आदि आते हैं तथा जिन ग्रन्थों में अनुष्ठानादि से भिन्न
आध्यात्मिक विषयों का विवरण है, उन्हें हम उपनिषद् कहते हैं । उपनिषद् ज्ञानकाण्ड
के अन्तर्गत आते हैं । कभी कभी उपनिषद् शब्द उन ग्रन्थों के लिए भी प्रयुक्त होता
है जो वेदों के अन्तर्गत नहीं आते हैं , जैसे “गीता” । किन्तु साधारणतः उपनिषद्
शब्द का प्रयोग वेदों के मध्य विकिर्ण दार्शनिक प्रकरणों के लिए होता है । इन्हीं
दार्शनिक प्रकरणों के संकलन को हम वेदान्त कहते हैं । उपनिषदों की संख्या 108 मानी
जाती है । इनका समय निर्धारण निश्चित रुप से नहीं किया जा सकता किन्तु कुछ गौण
उपनिषदों से इनके अर्वाचीन होने का संकेत मिलता है ।
इसी वेदान्त के,भारत में जो प्रचीन व्याख्याकार
थे उनकी व्याख्याओं से ही तीन मुख्य दार्शनिक पद्धतियों एवं सम्प्रदायों की
उत्पत्ति हुई – पहला द्वैत, विशिष्टाद्वैत तथा अद्वैत । इनकी अति प्रचीन
व्याख्याऐं तो लुप्त हो गयीं किंतु अर्वाचीन काल में बौद्ध धर्म के उत्थान के बाद
शंकराचार्य ने अद्वैत की, रामानुजन ने विशिष्टाद्वैत की तथा मध्वाचार्य ने द्वैत
मत की पुन:स्थापना की ।
अब हम छान्दोग्योपनिषद से कही अपनी “जाबालि और
श्वेतकेतु की कथा” पर फिर से आते हैं । उपनिषदों के अभ्युदय काल में कर्मकाण्ड इतना जटिल और विस्तारपूर्ण हो गया था कि उससे
मुक्त होना असम्भव सा कार्य हो गया । इसलिए या तो उपनिषदों में प्रचीन कर्मकाण्डों
को बिल्कुल छोड़ दिया गया या फिर कर्मकाण्डों में व्यावहारगत गूढ़ अर्थ दिखाये गए
। उपनिषत्कारों ने हमारे आधुनिक सुधारकों के समान यज्ञादि तथा अनुष्ठानों को
मिथ्या अथवा पाखण्ड कहकर उसका मजाक नहीं बनाया और ना तो इसके विरुद्ध बोलने एवं
प्रचार करने को ही अपना धर्म मान लिया । बल्कि उन्हीं कार्मकाण्डों का एक उच्चतर
तात्पर्य समझाकर एक यथायोग्य विचारधारा मनन करने को दी । उन्होंने यह नहीं कहा कि “अग्नि
में हवन मत करो” । उन्होंने कहा “अग्नि में हवन करो, बहुत अच्छी बात है । किन्तु
इस पृथ्वी पर दिन रात हवन हो रहा है। यह तुम्हारा क्षुद्र मन्दिर है , ठीक है !
किन्तु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही हमारा
मन्दिर है । हम कहीं भी उपासना कर सकते हैं । तुम वेदी पर अपनी पूजा चढाते हो,
किन्तु जीवित, चेतन मनुष्यदेह रुपी वेदी वर्तमान है। हम सभी की और इस मनुष्य देह
रुपी वेदी पर की गयी पूजा,दूसरी अचेतन, मृत जड़ प्रतीक की पूजा की अपेक्षा
श्रेयस्कर है ।
अब हम उपनिषदों से ही एक और कथा को लेकर वेदान्त
के आधार दर्शन का विवेचन करने का प्रयास करेंगे –
प्रचीन शिक्षा पद्धति में सत्यकाम नामक
विद्यार्थी के गुरु ने उसे चार सौ दुर्बल गायें देकर कहा – “इन्हें लेकर तुम वन
में चले जाओ और जब कुल गायें एक हजार हो जायें तब लौट आना । परिणामतः आज्ञापालन
करते हुए वह गायों को लेकर वन में चला गया । कई साल बाद इस झुण्ड में से एक प्रधान
गौ ने सत्यकाम से कहा, “ अब हम एक हजार हो गए हैं, हमें तुम अपने गुरु के पास ले
चलो । मैं तुम्हें ब्रह्म के विषय में कुछ शिक्षा दूँगी”। सत्यकाम ने कहा, “कहिए
माता” तब गौ ने कहा, “उत्तर दिशा ब्रह्म का एक अंश है, उसी प्रकार पूर्व दिशा,
दक्षिण दिशा और पश्चिम दिशा भी उसके एक-एक अंश हैं । चारो दिशायें ब्रह्म के चार
अंश हैं । अब अग्नि तुम्हे कुछ और शिक्षा देंगे”। तब अग्नि ने कहा, “यह पृथ्वी ही
ब्रह्म का एक अंश है, अंतरिक्ष एक अंश है, स्वर्ग एक अंश है, समुद्र एक अंश है”।
फिर अग्नि ने कहा, “ अब एक पक्षी तुम्हे कुछ शिक्षा देगा” । तब एक हंस उसके निकट
आया और उससे कहा, “हे सत्यकाम,जिस अग्नि की तुम उपासना करते हो वह भी ब्रह्म का ही
एक अंश है, सूर्य भी एक अंश है, चन्द्र भी एक अंश है और विद्युत भी एक अंश है”।
फिर हंस ने कहा कि अब मदु नामक एक पक्षी भी तुम्हें कुछ शिक्षा देगा”। अतः एक दिन
वह पक्षी आकर सत्यकाम से बोला, “यह प्राण उसका एक अंश है, चक्षु उसका एक अंश है,
श्रवण एक अंश है तथा मन भी एक अंश है”।
तब सत्यकाम अपने गुरु के पास लौटा और गुरु ने
उससे पूछा, “कि वत्स तुम्हे ब्रह्म शिक्षा किसने दी”?
तब सत्यकाम ने बताया, “मुझे मानवेतर प्राणियों
ने शिक्षा दी, किन्तु अब आप मुझे कुछ शिक्षा दें गुरुदेव”!
तब उसके गुरु ने कहा कि, “ वत्स अब तो एक ही
शिक्षा बची रह जाती है और वह है, “तत्वमसि” ।
यही वो महावाक्य है जिसमें समस्त सृष्टि अपने
चराचर के साथ निवास करती है-
अर्थात तत्+त्वम+असि= वह तुम हो !!
अब यदि हम कुछ देर के लिए गौ, अग्नि, हंस
इत्यादि रुपकों को हटा दें तो हम इस कथा के केन्द्रिय तत्व की ओर ध्यान दे सकेंगे
और वह तत्व यही कहता है कि “तुम जिसकी खोज में भटक रहे हो वह ब्रह्म तुम ही तो हो”।
और यही वो तत्व है जिसे विश्व के सभी धर्म और
दर्शनों ने अपनाया । और आश्चर्यजनक रुप से इसे पाने की पद्धति भी इसी से मिलती
जुलती है । चाहे हम मूसा की बात करें जिन्हें ईश्वर के दस आदेश मिले या पैगम्बर
मुहम्मद को मिली देवदूत की वाणी को ले। हम पायेंगे कि सभी महान धर्मोपदेशकों को
कहीं न कहीं एकान्त में महान तप करने के बाद कुछ ज्ञान मिला । यदि हम यह कहें कि
यह उन्हीं के अन्दर की वाणी थी तो क्या सन्देह है । अन्ततः हम इस सत्य पर पहुँचते
हैं कि-
वेदान्त का मूल आधार दर्शन है “अखण्डता” एवं
“एकता”-
वेदान्त बात करता है –“तत्वमसि” की – तुम
वही हो-
वेदान्त बताता है –“शिवोहम्”- “मैं शिव
हूँ”
वेदान्त दर्शन कहता है – “अहमब्रह्मास्मि”(I
AM THE DIVINE FLAME)
वेदान्त ही हमें अंततः –“सोहम्” की
परिधारणा देता है, अर्थात “वह मै हूँ”
वेदान्त के भाष्यस्वरुप मानी गयी
श्रीमद्भागवद्गीता भी इसी सत्य को उद्भाषित करती है-
चौथे अध्याय का चौबीसवाँ श्लोक-
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महर्वि ब्रह्माग्नौ
ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं,
ब्रह्मकर्म समाधिनां ।।
स्वामी विवेकानन्द तथा
वेदान्त की वैज्ञानिक अवधारणा
अब हम यह देखेंगे की इस वेदान्त को स्वामी विवेकानन्द
ने किस सरलता से जनसामान्य तक पहुँचाया तथा कितनी बोधगम्य वाणी में इसके सार तत्व
को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया ।
सर्वप्रथम स्वामी जी ने जिस सत्य को हमारे समक्ष
उद्भाषित किया वो यह है कि “वेदान्त कहता है कि जिस किसी भी चीज का नाम रुप है- वह
अनित्य है, अर्थात उसका आज नही तो कल नाश होना ही है”।
अब यदि हम इस सत्य के प्रकाश में अपनी मान्यताओं
को परखें तो एक सबसे बड़ी और घातक मान्यता जो टूटती है वह है “स्वर्ग की परिधारणा”
!!
हमारे समक्ष जितने भी धर्म हुए सभी ने किसी न
किसी रुप में पुण्यात्मा के लिए स्वर्ग की परिधारणा की । स्वर्ग अर्थात् उसके “पुण्य
का पुरस्कार” । अब यदि हम देखें कि वेदान्त के अनुसार सभी नाम एवं रुपधारी वस्तुएँ
अनित्य हैं । वह सब कुछ नश्वर है जिसे हम रुप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्श के रुप
में अपनी पाँचों इन्द्रियों से अनुभव कर सकते हैं – तो पुरोहितों द्वारा रचा हुआ
ये प्रपंच “स्वर्ग” भी अनित्य है, नश्वर है। क्योंकि यह भी तो नामरुप धारी है तथा
इसका भी तो हमें इन्द्रियगत ज्ञान ही मिलता है ।
और इसी के विपरीत यदि स्वर्ग की परिधारणा अनित्य
है, नश्वर है । यदि हमें किसी सुन्दर स्थान पर परिवारजनों के साथ चिरकाल तक रहने
का ये पुरस्कार प्रपंच है तो निश्चित ही इसी प्रपंच और भय की अगली कड़ी “दण्ड
अर्थात नरक” की परिधारणा भी अनित्य होगी, नश्वर होगी।
हमारे उपनिषद् बताते हैं कि “अनन्त स्वर्ग स्वयं
का विरोध करने वाला एक वाक्य मात्र है, जिस प्रकार यह पृथ्वी अनन्त नहीं हो सकती
उसी प्रकार जिस किसी भी वस्तु की उत्पत्ति काल में है, स्थिति काल में है तथा
विनाश काल में है । वह कभी भी अनन्त नहीं हो सकता । वेदान्त का यह स्थिर सिद्धान्त
है – अतएव अनन्त स्वर्ग या नरक की धारणा व्यर्थ है ।
स्वामी जी ने वेदान्त के उद्भव पर प्रकाश डालते
हुए कहा कि- बहुत दूर जहाँ न तो लिपिबद्ध इतिहास और न परम्पराओं का मन्द प्रकाश ही
प्रवेश कर पाता है, अनन्त काल से वह स्थिर उजाला हो रहा है, जो बाह्य परिस्थितिवश
कभी तो कुछ धीमा पड़ जाता है और कभी अत्यन्त उज्जवल, किन्तु वह सदा शाश्वत और
स्थिर रहकर अपना पवित्र प्रकाश केवल भारत में ही नहीं , बल्कि सम्पूर्ण विचार-जगत
में अपनी मौन अननुभाव्य, शान्त फिर भी सर्वसक्षम शान्ति से उसी प्रकार भरता रहा है
। यह प्रकाश उपनिषदों के तत्वों का, वेदान्त दर्शन का रहा है । कोई नहीं जानता कि
इसका पहले-पहल भारतभूमि में कब उद्भव हुआ।
फिर भी मैं बिना किसी संकोच के कह सकता हूँ कि
यह वेदान्त, उपनिषद प्रतिपाद्य दर्शन, आध्यात्म राज्य का “प्रथम और अन्तिम विचार
है जो मनुष्य को अनुग्रह के रुप में प्राप्त हुआ है” ।
क्योंकि वेदान्त कहता है कि तुम सब दिव्य हो –
बल्कि तुम सबको दिव्य होना ही पडेगा । कोई ग्रन्थ तुम्हारे कार्यों तथा अस्तित्व
का प्रमाण नहीं हो सकता, तुम्हीं ग्रन्थों के अस्तित्व का प्रमाण हो । कोई पुस्तक
तुम्हें सत्य की ही शिक्षा देती है यह किस प्रकार जानते हो?
क्योंकि तुम सत्य स्वरुप हो , नित्य-शुद्ध-बुद्ध
हो, और तुम सत्य सुनने या पढ़ने पर वही अनुभव करते हो जो सत्य का अनुभव है । वरना
हम कैसे अन्तर कर सकते हैं सत्य और असत्य में । हमारी दिव्य आत्मा ही ईश्वर की
दिव्यात्मा का प्रमाण है ।
वेदान्त कहता है कि यदि तुम वास्तविक महापुरुष
नहीं हो तो ईश्वर के सम्बन्ध में भी को बात सत्य नहीं । यदि “तुम” ईश्वर नहीं हो
तो ईश्वर भी नहीं है, और ना ही कभी होगा। यदि पाप नामक कोई वस्तु है तो वह यही है
कि हम सदैव अपनी दुर्बलता का मनन करें ।
वेदान्त का ईश्वर
अब प्रश्न यह उठता है कि, “वेदान्त में ईश्वर की
क्या परिधारणा है”?-
वेदान्त का ईश्वर क्या है ? – “वह ईश्वर कोई
व्यक्ति नहीं, विचार है, तत्व है” । वेदान्त जिस आत्मन् को ईश्वर कहता है उसे
प्रवचन अथवा बुद्धि से प्राप्त नहीं किया जा सकता ।
“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो, न मेधया” ।
हम सब सगुण ईश्वर हैं । विश्व का परात्पर ईश्वर,
विश्व का स्रष्टा, विधाता और संहर्ता परमेश्वर कोई विशेष व्यक्ति नहीं अपितु
निर्विशेष तत्व है। वह तो अपनी आत्मा की ही उपासना की बात करते हैं।
वेदान्त का ईश्वर यही है , जिसका स्वर्ग सर्वत्र
है और इस स्वर्ग में समस्त सगुण ईश्वर निवास करते हैं । चाहें वो मनुष्य हो या
चूहे बिल्ली ।
स्वामी विवेकानन्द ने वेदान्त को जिस सरलता से
व्याख्यायित किया तथा उसके गूढ़ तत्वों का विवेचन किया उससे भारत ही नहीं अपितु
सम्पूर्ण विश्व की अधिकांश समस्या के समाधान पर प्रकाश पड़ता है । वेदान्त की ओर
से जो महान प्रश्न उठाया गया है वह प्रश्न यह है कि “लोग इतने भयभीत क्यों हैं” ?
और इसका जवाब हमें सम्पूर्ण वेदान्त में जगह- जगह मिलता है – इसका उत्तर
मुण्डकोपनिषद् से मैं देना चाहूँगा-
यथोर्णनाभिः सृजते गृहणते च
यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति ।
यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि
तथाक्षरात्संभवतीहं विश्वम् ।।
अर्थात “जिस प्रकार जाल में बैठा हुआ मकड़ा जाल
फैलाता है और धागों को पुनः समेट लेता है, जिस प्रकार बिना किसी प्रयत्न के ,
मनुष्य के सिर पर बाल उगते हैं उसी प्रकार ज्ञान एवं आनंद के उस असीम महासागर से
यह विश्व निकलता है”- मुण्डकोपनिषद्
इसलिए जब हमारी आत्मा ही कार्य-कारण, फल-अफल से
परे है तो भय क्यों ?
हमने अपने आप को इतना असहाय और पराश्रित क्यों
बना लिया है ? हम स्वयं अपने लिए कुछ करना ही नहीं चाहते । हम अपना प्रत्येक कार्य
कराने के लिए किसी ईश्वर , किसी त्राता या किसी पैगम्बर की कामना करते हैं ।
सहायता प्राप्त करने के लिए दर दर फिरना मूर्खता है बिल्कुल वैसे ही जैसे एक राजा
पागल हो गया और फिर सम्पूर्ण नगर में “राजा कहाँ है” का प्रश्न करते हुए भटकता रहा
।
वेदान्त यही सारभूत करता है कि मनुष्य को कोई
सहायता न तो कभी मिली न मिल रही है और न ही मिलेगी । और क्योंकि हम सभी में एक ही
तत्व है तो कौन किसकी सहायता कर सकता है। जिस ब्रह्म से सम्पूर्ण विश्व की
चैतन्यता व्याप्त है , क्या उस परब्रह्म स्वरुप मानव की कोई सहायता कर सकता है ?
कभी नहीं !!
फिर भय किससे और सहायता क्यों? यही वेदान्त का
आधार दर्शन है ।
मानव दुर्बलता का कारण “भ्रम”
हम सभी भ्रम में जी रहें हैं । और आनंद की बात
यह है कि कोई भी उस भ्रम की स्थिति से बाहर नहीं आना चाहता ।
हम सभी देह, मन और आत्मा को अलग-अलग मान लेते
हैं । किन्तु वास्तविकता में एक ही सत्ता है जो हम सभी में व्याप्त है।
अद्वैतवाद में साँप तथा रस्सी का एक आनन्ददायक
और प्रभावी उदाहरण दिया जाता है ।
अन्धेरे से तथा अन्य किसी कारण से लोग रस्सी को
साँप समझ लेते हैं किन्तु इसका ज्ञान होने पर “सर्प भ्रम” मिट जाता है तथा उन्हें
अपनी गलती का आभास होता है और केवल रस्सी दिखाई देती है । इस उदाहरण से हम यह समझ
सकते हैं कि जब सर्पज्ञान होता है तब रज्जुज्ञान मिट जाता है तथा जब रज्जुज्ञान
होता है तब सर्पज्ञान मिट जाता है ।
जन्म से ही हमें यह बताया जाता है कि हम दुर्बल
हैं । बच्चों के अन्दर विभिन्न कपोलकल्पित चीज़ों का भय उत्पन्न किया जाता है ।
किन्तु हमें अपनी शक्ति का ज्ञान, विश्लेषण एवं विचारों के द्वारा ही होता है । इस
संसार में जितना ज्ञान है वह कहाँ से आया ?
वह हमारे भीतर ही था । हमारे वेद भी श्रुति और
स्मृति ही हैं । वहाँ कोई ज्ञान कभी नहीं था । वह हमेशा से हमारे भीतर ही था ।
आपके सामने जब विशालकाय वटवृक्ष आये तो कल्पना
करिएगा कि इतनी ऊर्जा और ऐसा आकार क्या एक सरसों के दाने के समान बीज में हो सकता
है ? नहीं । लेकिन सत्य क्या है ? ये सम्पूर्ण आकार और ऊर्जा उस बीज में ही तो
थी जिसका परिणाम यह वटवृक्ष है । यदि
शक्ति का भंडार आप खाद्य सामग्रियों या औषधियों को मानते हों तो रोटी और चावल का
पर्वत बना दीजिए उसमें उसकी अपनी ऊर्जा है आपकी नहीं । वह ऊर्जा तो हममें पहले से
ही है । हम केवल उसे पोषित करते हैं ।
वेदान्त का सार-रुप प्रभाव
इस प्रकार उपरोक्त विवेचन से हम यह पाते हैं कि
सभी धर्मों में लक्ष्य एक ही होने के कारण वेदान्त का किसी से किसी प्रकार का कोई
झगड़ा नहीं है । वह सभी धर्मों को उस अखण्ड महासागर की प्राप्ति के लिए अनेक विभिन्न
मार्गों से प्रवाहित नदी के रुप में देखता है।
वेदान्त किसी की निन्दा नहीं करता क्योंकि
मनुष्य जिस रुप में इस समय है इस रुप में वेदान्त उसे नहीं देखता वरन् उसके
वास्तविक स्वरुप में उसे देखता है। वेदान्त हमें सिखाता है कि पाप और पुण्य , कर्म
और अकर्म कुछ भी नहीं है, प्रत्येक व्यक्ति कभी न कभी अपने यथार्थ रुप को पहचानेगा
और अपने को समस्त ज्ञान , शक्ति और आनन्द के उद्गमस्थान के रुप में साक्षात अनुभव
करेगा । इच्छा और अनिच्छा पूर्वक प्रत्येक व्यक्ति अपने प्रत्येक कर्म से होकर उसी
परमलक्ष्य की ओर अग्रसर हो रहा है। कर्म योगी दूसरों की सेवा करके, ज्ञानयोगी अपनी
विचार शक्ति का विकास करके , भक्त अपनी
भावना या भक्ति का विकास करके, सभी विकास की उस सर्वोच्च अवस्था अर्थात “इन्द्रियातीत
अखण्ड ब्रह्म” को प्राप्त करेंगे ही ।
अब प्रश्न उठता है कि यदि कोई व्यक्ति नास्तिक
हो अथवा अज्ञेयवादी हो तो क्या वह भी उसी पथ पर है ?
वेदान्त कहता है कि प्रश्न यह है कि क्या वह
व्यक्ति जिस भाव का पोषण अपने ह्दय में कर रहा है उसके लिए वह ह्दय से सच्चा है ?
और क्या वह अपनी धुन का पक्का है?
क्या जिस सत्य को उसने पहचाना है दुसरों की भलाई
के लिए उस सत्य के प्रति सम्पूर्ण रुप से आत्मसमर्पण करने को तैयार है ? यदि हाँ ,
तो वेदान्त कहता है कि उसके लिए कोई भय
नहीं । वह उच्चतर सत्यों की ओर बढ़ेगा और अन्त में सर्वोच्च सत्य को प्राप्त कर
लेगा । धार्मिक विचारों में अनंत विभिन्नताएँ होने दो । तुम अपने मार्ग पर चलो और
दूसरों को उनके मार्ग पर चलने दो । वेदान्त की यही महान शिक्षा है । क्योंकि मार्ग
भिन्न होते हुए भी लक्ष्य तो एक ही है । हम विश्व के लिए अपने को मापदण्ड न समझ
लें, परन्तु यह समझें कि इस विश्व की पृष्ठभूमि एकता ही है और मनुष्य किसी भी मार्ग
पर चले अन्त में उसी लक्ष्य पर पहुँचेगा ।
तदेजति तन्नैजति तद्दूरे
तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्यं सर्वस्यं दतु
सर्वस्यास्य बाह्यतः ।।
-इशोपनिषद
(वह क्रियाशील और निष्क्रिय भी, वह दूर भी और
समीप भी । वह उसके भीतर विद्यमान है और बाहर भी)
अन्ततः जिस वेदान्त की हमने यहाँ चर्चा की वह
कोई नया धर्म नहीं है । वह स्वयं ईश्वर की भाँति प्राचीन है । देश काल के बन्धन
उसे बाँध नहीं सकते , वह सर्वत्र है । प्रत्येक को इस सत्य का ज्ञान है । व्यक्ति
से परिवार , परिवार से कुल , कुल से कबीले, कबीलों से राष्ट्र, राष्ट्रों से मानवता,
यह क्या है ? क्या यह उसी एकत्व की ओर बढ़ने का इच्छित अथवा अनिच्छित प्रयास नहीं
है ?
वेदान्त अन्ततः यही सिखाता है कि सनकी ,
हत्यारा, चोर , अमीर , गरीब, राजा, भिखारी, योगी सभी एक लक्ष्य की तरफ बढ़ रहें
है। हमारा काम इतना ही है कि अनजाने मे जो हम करते हैं उसे जानकर समझकर करें, अधिक
दिव्यता और समग्रता से करें। हमने जिस एकत्व के साथ जन्म लिया है उसे हम चाहकर भी
अस्वीकार नहीं कर सकते । वह एकत्व प्रत्येक घटना में अपने आपको सिद्ध करता रहा है
, कर रहा है, करता रहेगा ।
आवश्यकता केवल इसे समझने भर की है।
संदर्भ ग्रंथ-
1-
छान्दोग्योपनिषद्
2-
कठोपनिषद्
3-
ईशावाष्योपनिषद्
4-
ईशोपनिषद्
5-
मुण्डकोपनिषद्
6-
श्रीमदभाग्वद्गीता
7-
शिवमहिम्नस्तोत्र
8-
COMPLETE WORKS OF SWAMI VIVEKANANDA
9-
LECTURES FROM COLOMBO TO ALMODA
10-
LETTERS OF SWAMI JI
11-
VEDANTA- PHILOSOPHY
12-
HOLY BIBLE
13-
QURAN-E-SHARIF
प्रस्तुतकर्ता:-
“सुमित सिंह दीक्षित”
-(चतुर्थ सेमेस्टर)
विज्ञापन एवं जनसम्पर्क विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार
विश्वविद्यालय, भोपाल-
सुमित जी प्रणाम, वैसे मैं कोई लेखक नही ना तो मेरा कोई चिट्ठा ही है,,,,,, आज यूँ ही आवारगी करते करते आप जैसे आवारा मजदूर से टकरा गया,,, आपको बता दूं की जिस तेज़ी से हिन्दी चिट्ठा जगत मे वृद्धि हो रही है उसकी मिसाल केवल जनसंख्या वृद्धि से ही दी जा सकती है,,,,,,,,,
ReplyDeleteआपने भी नया पता ही लिया है, सो पहली चीज़ जान लीजिए कि ये अपने आपको तथागत, बुद्धिजीवी, कलमकार और ना जाने क्या क्या तमगे दिए बैठे आत्ममुग्ध बड़े बड़े ब्लागर आपको कोई भाव नही देंगे क्यूंकी इन्हे डर है क़ि बरसों से चलती इनकी तानाशाही की नाव में कोई छेद ना कर दे,,, लेकिन खुले दिल से कह रहा हूँ बंधु आप भीड़ बढ़ाते और एक ही टेर में चिल्लाते बरसाती मेंढकों से अलग हो... कारण भी बताय देता हूँ
जब आपके ब्लाग पर नज़र पड़ी तो सोचा होगा कोई नया कवि या कहानीकार... मगर एक पोस्ट पर नज़र पड़ी तो शीरसक था वेदांत पंडितों की बपौती नहीं... भाई वाह...... मैने अपनी पूरी जिंदगी में वेदांत नाम ही गिने चुने बार सुना था सो मुझे क्या पता ये किस चिड़िया का नाम है अलबत्ता इतना पता था की वेद चार होते हैं,,,, मैं भी आम हिंदुस्तानियों की मानिंद यही मानता था की ये वेद वेदांत और तमाम ग्रंथ पंडितों की बपौती ही हैं फिर सोचा बंदा ऐसा क्यूँ कह रहा है की ऐसा नही है...आपका लेख अंत तक पढ़ डाला...कहने मे कोई झिझक नहीं की आपके सामने खुद को और खुद की सोच को बौना पाया... वेदांत समझा सो अलग... फिर सोचा नया लड़का है कहीं से टीप लिया होगा लेख, कमी थोड़े ना है देश मे विद्वानों की,,,,फिर मन नहीं माना तो बारी बारी से आपके सारे लेख पढ़ गया ,,,
बस इतना समझ लीजिएगा कि बहुत समय बाद किसी दबंग लेखक को पढ़ने का मौका हाथ लगा था......और ये मैं मानने वाला अकेला नही हूँ सुमित जी,,,,,आपके ब्लाग की पड़ताल से पता चलता है कि इसे बने दस दिन भी नही हुए और इसकी पाठक संख्या हज़ार के पार पहुँच गयी है ,,,, इसका मतलब इन तथागत लेखकों में खलबली तो मची ही हुई है,,,,.मगर कोई कुच्छ कह नही रहा,,,,मत कहें लेकिन आप डटे रहिएगा बंधुवर आपका समय जल्दी ही आएगा ,,,,, बस इतनी सी इलतेज़ा है कि खोखली बहेसबाज़ी मे कभी मत फँसीएगा ,,, बाकी आप के सामने हम चीज़ ही क्या हैं जो आपको समझाइश दें ,,,, लिखते रहिए बेधड़क
समीर जी कोई भाव नहीं देगा, ना सही यहाँ तो बस इस बात की फ़िक्र बनी रहती है कि अपनी नज़र में अपना भाव बना रहे, बाकियों की नज़र के भाव से मैं कौन सा विश्वबैंक में पड़ी एक पीली धातु के समकक्ष हो जाऊँगा। खैर आपको यदि लेख पढ़ने के बाद ये समझ में आ गया कि वेदांत किस चिड़िया का नाम है तो मुझे प्रसन्नता हुई। बस अब कौन किसकी नाव में छेद करने जा रहा है इससे किसी को क्या लेना देना। आप जैसे ज़िम्मेदार पाठक जिसके पास हों वो ऐसे निरर्थक काम भला क्यूँ ही करेगा।
ReplyDeleteआपकी प्रशंसाओं के लिए नतमस्तक हूँ ।
bahut hi gehan jankari isme aapne de di sumit ji...balki is lekh ko padhne ke baad vedant ke barey me shayad hi koi duvidha bachi rah jayegi...kya aapke paas sabhi Upnishad uplabdh hongey. mujhe kuch to mil gaye kuch nahi mil rahe. jaise shwetashwar upnishad nahi milta.
ReplyDeleteis lekh ke liye bahut badhaai