Tuesday, 23 April 2013

अपनी-अपनी सान, अपनी-अपनी धार

आहत सभी हैं, दिल सभी के दुखे हैं ! पर किससे आहत हैं ?... उस दिन से आप भी अपनी बेटी,बहन,पत्नी को उस लड़की की जगह रखकर सोच रहे हैं और सहमे हैं ना ?... सिर्फ़ एक पल के लिए सोचिए,"अगर उन बलात्कारियों में से कोई आपका भाई,बेटा,दोस्त होता तो?"... क्यूँ नहीं हो सकता ? अगर पूरा विश्वास हो कि कोई बलात्कारी आपके घर में नहीं, तभी उस लड़की के लिए एक भी लफ़्ज़ बोलिएगा और "बलात्कार की परिभाषा फिर से देख,पढ़, समझ लीजिए" !! और अगर रत्ती भर भी शक हो अपने संस्कारों पर तो ""असल मुसीबत आप ही हैं..."" !!! बुरा लग रहा है ना ? तो समझिए अभी आप भी "मनसा, वाचा, कर्मणा सड़क के उस तरफ ही हैं" ...

रौशन होने की कोशिश में है इक चिराग ,
इंसानियत बचाए रखने में मददगार होगा ;
बेशक ये खो जाए ,सूरज के उजालों में ,
मगर अमावास की रात का यही पहरेदार होगा !!!

आज तपती धुप में एक सिक्ख परिवार को जब" निष्काम कर्म " करते देखा तो बरबस ही ख़याल आया की इन्होने गीता पढ़ी हो या नहीं ...लेकिन हर तरफ नाउम्मीदी के स्याह साए में एक रूहानी मुस्कान की छोटी सी ही सही वजह तो ये हैं ही ...बूढ़ी सिक्ख माँ जिस तरह बिना जात और मजहब के सवाल में उलझे हर प्यासे को शरबत पिलाती थी , देखकर आँखे भर आई ...जितनी देर हो सका सिक्ख परिवार का हाथ बंटाया , और फिर चलते चलते उस माँ के हाथ से" परसाद " पाया ...मंदिर का चरणामृत जितनी श्रद्धा ईश्वर में आज तक नहीं जगा पाया ...उतनी भारत के इस तथाकथित सभ्य समाज के बीचोबीच होने वाले वास्तविक मानवीय प्रयास के इस यग्य के चरणामृत ने जगा दी ... आज के दिन के लिए आत्मा तृप्त है ...

भोर के तारे सी अविचल मैं,
"निहारिका" सी हूँ अनंत ;
चन्द्रकिरण सी हूँ "विनम्र"
मेरे स्वप्नों का कहाँ अंत !!

मुझे मिला जीवन कण-कण में,
बिखरे हैं जो अधिकाँश यहीं ;
मानव लिखता है स्वयं भाग्य,
है सृष्टि का सारांश यही ....
है सृष्टि का सारांश यही .......!!!!
 

ये शेर वाकई में मेरे नहीं ...विलायत जा चुके उस लड़के की माँ के हैं , जो आज भी उम्मीद की शमाँ जलाए बैठी है ...पाँव से लाचार है, मगर हर रात बेटे के पास चली जाती है ख़्वाबों में ...मैंने सिर्फ अल्फाज दिए हैं ...ये मक्ता आज भी हूबहू उस माँ की आँखों में है !!! और जब इसे उस माँ ने सुना तो भरे गले और भीगी आँखों से आसमान के पार देखने लगी ...जैसे उसका बेटा भूख लगने पे पुकार रहा हो ...

एक कलमकार ने स्याह रात की स्याही घोली ...और एक गीत लिखा ...गीत का मेहनताना 300 रु तय हुआ था और पूरी फिल्म का 1500 रु ...जो आज भी बकाया है ... गीत आज लाखों लोगो की मोबाइल धुन है और हज़ारों स्कूलों की प्रातः प्रार्थना...कई लोग इसी गीत से दिन की शुरुआत करते हैं ...गीत था 1986 में "एन चंद्रा" निर्देशित "अंकुश " फिल्म का ...."इतनी शक्ति हमें देना दाता , मन का विश्वास कमजोर हो न ..." ...और चित्र में हैं गीत लिखने वाले गीतकार "अभिलाष" ...स्थिति निराशाजनक है ...अपनी आँखों में आते पानी को छुपाकर , वही लेखकीय मुस्कान लाते हुए कहते हैं ..."बेटा ...कहीं शॉल,श्रीफल.स्मृतिचिन्ह से पेट की आग बुझती है ??? "...और अपने आशीर्वाद के साथ छोड़ जाते हैं एक जलता हुआ प्रश्न ....उन लोगों के लिए जो "शीला की जवानी" सुनकर अपना सर धुनते हैं...और अच्छे गीतकारों की कमी पर नुक्कड़ और बसों में अन्धाधुंद बहस करते हैं ....क्या वो और ये मायानगरी वाकई में ऐसे गीतकारों के लायक हैं ?? जिनके गीत वक़्त के साथ जवान होते जाते हैं ...है जवाब किसी के पास ???!!!

ताई तुम्हारे लिए ---
बगल के नुक्कड़ पर "रहमत बेगम" रहती हैं, मैं उन्हें ताई कहता हूँ ....बेवा हैं और चाय की दुकान चलाती हैं ....उम्र ने बहुत तजुर्बा दिया है और इस बात का फक्र भी है उन्हें ....सारे सिद्धांत, आदर्श, दर्शन, विज्ञान उनकी चौखट पे आकर चाय पीते हैं ...और अपनी बेचारगी को जिंदगी के चूल्हे पर उबाल उबाल कर ताई मुस्कुराते हुए जी रही हैं ....ताई ने परसों कहा की कुछ मुझपर भी लिख ....देखूँ तेरी कलम मेरा दर्द किस हद तक महसूस करती है .... मैंने कोशिश कर ली और उन्हें कल सुनाऊंगा ....आज आप अगर इस दर्द को महसूस कर सके तो ....ताई के लिए दुआ मांगिएगा ....बेटी के निकाह के लिए बैंकों के चक्कर काट रही है ताई
 ...

एक ही पत्थर किसी गलत हाथ में पड़ जाए तो किसी का जख्म बन जाता है ....किसी माइकल एंजेलो के हाथ में आ जाए तो हुनर का शाहकार बन जाता है ....किसी का चिंतन उसे छू ले तो शिलालेख बन जाता है और किसी गौतम का स्पर्श पा ले तो वज्रासन बन जाता है !!! वैसे ही है मजहब ...जितने जेहन उतने मजहब ....हिन्दू-मुस्लिम कट्टरता के मिथ को महज एक मुस्कान से तोड़ता हुआ ये शख्स आपको उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर के आस-पास दिखाई देगा !! पिछले दस साल से शिव ज्योतिर्लिंग की तस्वीरें घूम-घूम कर बेचते हैं ...वो भी बेहिचक-बेलाग (इनके हाथ में गौर करें ) !!! दुनिया का इतिहास हर मजहब के नाम पर खून से भीगा हुआ है .....वजह सिर्फ इतनी है की जिन्हें लोगों को मजहब की तालीम देनी चाहिए वो दर दर की ठोकरें खा रहे हैं ........और मजहब को जनेऊ, त्रिपुंड और टोपी ,दाढ़ी की तरह बाहर से ओढने वाले खाप फैसले और फतवे जारी कर रहे हैं ...

करीब पाँच साल पहले चार उत्साही युवकों ने इलाहाबाद के अल्फ्रेड-पार्क में आपसी सलाह करके एक दत्तचित्त परन्तु असफल प्रयास किया था .....एक मासिक साहित्यिक पत्रिका निकालने का ...नाम बड़े जतन से रखा "युवा-मन".... उस प्रयास के इतिहास में ना जाते हुए आज सहर्ष यह घोषणा करने का साहस कर पा रहा हूँ कि ....इस बार अनुभवी और विज्ञ-जनों के मार्गदर्शन में ये प्रयास इश्वर कृपा और आप सभी के सहयोग से पूर्ण होगा ऐसी आशा है ....
आप सभी युवा साथियों से अनुरोध है कि आपकी अप्रकाशित या प्रकाशित कोई भी रचना जो आपको स्तरीय लगती हो चाहे वो कहानी,कविता,गीत,गजल,शायरी,धारावाहिक उपन्यास,यात्रा-संस्मरण कुछ भी हो उससे "युवा-मन" को अवश्य अवगत कराएं ..... याद रखिये शरतचंद्र जैसे कथाशिल्पी भी इसी मार्ग से साहित्याकाश में पहुँचे.... मुझसे कहीं भी मिलकर अपनी रचना से अवगत कराएं 

मोहम्मद दारा शिकोह की पुस्तक "मजमा-अल-बाहरेन" (दो महासागरों का मिलन) में भारत की साझा संस्कृति का सुन्दर वर्णन पढ़ा ! वे भारत को हिन्दू-मुस्लिम धर्म का मिलन स्थल कहते हैं ! जैसे उर्दू , हिंदी और फ़ारसी की अंतःक्रिया से जन्मी ! अकबर के खजाने के प्रभारी जैसे टोडरमल थे, वैसे ही शिवाजी के सबसे विश्वासपात्र सचिव थे मौलाना हैदर अली !! मेवाती मुसलामानों के पूर्वजों का विवरण हिन्दू पंडितों के पोथों में दर्ज रहता है और केरल के नवायत मुस्लिम विवाह के समय अग्नि के चारों ओर सात फेरे लगाते हैं ..............फिर कौन आज मजहब के नाम पर बस्तियाँ जला रहा है ........ज़रा सोचिये !!! जवाब आपके पास ही है ; 

हिंदी दिवस पर विशेष बोलबचन........!!!

एक बच्चा है ! नाम है हिन्दुस्तानी , उसके पिता ने दो शादियाँ कीं ; जाहिर है नयी माँ पुरानी वाली से खूबसूरत, कमसिन, पैसे वाली और उसके बाप को मुट्ठी में रखने वाली थी !! पुरानी माँ सीधी-साधी कोने में पड़ी,बिना किसी छल प्रपंच के ! पिता को बाहर जाना होता तो नयी माँ, बच्चे को पैसे चाहिए तो नयी माँ, कोई फैसला करना होता तो नयी माँ, घर में मेहमान आ गए तो नयी माँ, पिता से कोई बात मनवानी हो तो नयी माँ !!!!!
लेकिन जब बच्चा टीचर की मार खाकर लौटता तो पीठ पर हल्दी लगाने के लिए वही पुरानी माँ, जब-जब पिता की तबियत खराब होती तो दिन-रात सेवा के लिए वही पुरानी माँ, जब किसी बात पे रोते हुए बच्चा सोता तो माथे पे हाथ फिराकर चादर उढाती वही पुरानी माँ, अपने हिस्से की मिठाई बेटे के हाथ पर धर के उसकी मुस्कराहट देखती वही पुरानी माँ, ..............उसकी अपनी माँ !! उसे पैदा करने वाली माँ ...... उसे अपनी सौत से कई जलन नहीं ! उसे तो ख़ुशी होती है अपने पति और बेटे की ख़ुशी देखकर .............मगर इतना ही चाहती है वो कि जब पति थका हारा वापस आये तो कभी उसके कोने वाले कमरे कि खिड़की से उसे सोता हुआ देख जाए !! और उसका बेटा जब परीक्षा में अव्वल आये तो उसके भी पाँव छूकर आशीर्वाद ले .........!!!
इतना हक तो उस बच्चे पर इस बुढ़िया का बनता ही है न ??

ये बच्चा है वो शख्स जो इसे इस वक़्त पढ़ रहा है ................और उसकी नयी माँ है - "अंग्रेजी"..................और पुरानी माँ है - "जिसका आज दिन है हिंदी".....!!!

बस इतनी सी ही कहानी है ......जिसे हम तमाम लफ्जों में अलग-अलग मायने दे रहे हैं !!
फुसलाते हैं ,
बसंती हवा के झोंके और छाँव :
मगर, धूप में तपता पेड़ 
और मजदूर के माथे का पसीना ;
चीखते हैं ,
रुकना मत, झुकना मत !!

बहलाते हैं ,
नीला समंदर और पूरनमासी का चाँद ;
मगर, रोटी के लिए बिलखता बच्चा
और पानी में पत्थर उबालती माँ :
गिडगिडाते हैं ,
रुकना मत, झुकना मत !!! 
अभागा है वह देश ?
जिसके पास नहीं हैं,
मृत स्वप्नों को 
घसीटने वाले और,
आदर्श बन सकने वाले 
उत्साही नायक ?
गलत !!!
अभागा है वह देश 
जिसके स्वप्न मृत हों 
और धुंधले पड़ जाने वाले 
आदर्शों के लिए जिसे ;
नायकों की आवश्यकता है !!!

15 अक्टूबर, आज के ही दिन इलाहाबाद के दारागंज मोहल्ले में राय साहब की कोठी के एक छोटे से कमरे में "सूर्यकांत त्रिपाठी" नामक एक ख्यातनाम कवि दवाइयों के अभाव में काल का ग्रास हुआ l हम सभी उनके उपनाम "निराला" से परिचित हैं l जीवन भर ये व्यक्ति नंगे पाँव रहा ! पैसों के अभाव में इनकी बेटी सरोज ने इन्ही की गोद में दम तोड़ दिया l कभी समय मिले तो "सरोज स्मृति" पढ़िएगा ! एक एक शब्द जैसे ह्रदय में कील ठोंकता है ! फिर भी निराला गुलाब को लताड़ने में हिचकिचाए नहीं ! "कुकुरमुत्ता" में लिखते हैं "अबे सुन बे गुलाब ........भूल मत जो पाई खुशबू, रंगोआब,....... खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,...... डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट;..........बहुतों को तूने बनाया है गुलाम,.....माली कर रक्खा, खिलाया जाडा घाम;" !!!
हमें कोई अधिकार नहीं कि हम निराला के नाम का पुरस्कार, छात्रवृत्ति, डाकटिकट आदि जगहों पर उपयोग करें ........हम ऋणी हैं इस महात्मा के ....और साहित्य कि शिराओं में प्रवाहित रक्त कि अंतिम बूँद भी इस ऋण का एकांश नहीं चुका सकती !!!
ऐसी उत्कट जिजीविषा और उत्साह को शत शत नमन .....अस्तु ! उसी राय साहब कि हवेली में मैंने दसवीं के लिए ट्यूशन पढ़ा है ...और तब भी बार बार इनके होने का आभास मुझे उन्मादित कर जाता था !
 

मेरा विश्वास है कि चूहे पर बिल्ली, बिल्ली पर कुत्ते, कुत्ते पर शिकारी कुत्ते और शिकारी कुत्ते पर बाघ को उकसाकर अपना मतलब साधने वाले तमाशबीनो की मुट्ठी मे तब तक ख़ालीपन रहेगा, जब तक हिंद के किसी भी कोने में इतिहास को पहनने ओढ़ने का जज़्बा एक भी शख्स में ज़िंदा रहेगा l एक शख्स ने अपनी तमाम जिंदगी बीहडों में डाकू बनकर और बाकी दर्जनों हत्याओं के लिए मिली ताउम्रक़ैद में निकाल दी l अंगुलीमाल का साक्षात रूप बनकर l मगर फिर इस शख्स को एक किताब मिली "सत्य के प्रयोग", और बस फिर क्या था ... बचा हुआ जीवन खादी, गाँधी जी और भारतवर्ष को समर्पित !! आप हैं भारत के प्रख्यात गाँधीवादी "श्री सुरेश सर्वोदयी जी" ... सड़क चलते हुए भी आपकी फेंकी हुई डिस्पोजल खुद उठाकर चुपचाप आगे बढ़ जाते हैं l अगर कभी किसी युवा के हृदय से लेशमात्र भी उत्साह कम हो तो एक बार सुरेश जी को याद करिएगा. शायद गाँधी के शरीर से अंतिम समय निकलता रक्त अपनी दुहाई माँगता महसूस हो l पुरस्कारों,भाषणों,दान,धर्म और वाद से कहीं दूर भारत के कोने-कोने में एक विश्वास की अलख जगाते भारतीपुत्र को मेरे रोम-रोम से नमन... एक विश्वास "भारत अभी जीवित है" ... !!!

भारत पाकिस्तान बँटवारे के दुर्दिन थे जब एक बच्चे के माता-पिता की हत्या उसी की आँखों के सामने की गयी l किसी तरह जान बचाकर बच्चा उत्तर प्रदेश में अपने मामा के यहाँ बनारस पहुँचा l और अपने किशोरवय से ही "हिन्दी" के सहज प्रेम में पड़ गया l वो हिन्दी ज़बान का ना होते हुए भी उसकी वंदना अपनी लेखनी से करने लगा l आज वो बच्चा हिन्दी का लाड़ला बन चुका है l अभी अपने जीवन के ८० वर्ष होम करके हिन्दी शब्दकोष के जीवंत एवं सशक्त हस्ताक्षर बन चुके काशीरत्न डाक्टर "बदरीनाथ कपूर" को "भाषारत्न" की उपाधि से अलंकृत किया गया l दर्जनों अभूतपूर्व हिन्दी कोष लिखकर जापान तक हिन्दी का विजयरथ ले जाने वाले हिन्दी के इस सुपुत्र को अभी भी अर्थाभाव के कारण घंटों काम करना पड़ता है l बिना माँगे हिन्दी को अपना जीवन समर्पित करने वाले इस भारतभारती को भी प्रकाशकों के मायाजाल में उलझ के रह जाना पड़ा l जितनी निश्च्छलता और प्रेम से किसी भी हिन्दी के नवागंतुक से कपूर साहब मिलते हैं कोई बिरला ही मिलेगा l इस बार मिलकर प्रसन्न हुए और कुछ कुछ निश्चिंत भी l हम जैसे लोग इनकी निश्चिंतता का कारण बने इतनी ना तो सामर्थ्य है और ना ही जीवटता ; फिर भी भेंटस्वरूप अपनी दस वर्षों तक उपयोग की हुई पुस्तक सहर्ष दी l कपूर साहब भले ही गुमनाम अंधेरो में साँस ले रहे हों मगर हिंदीभाषियों को यह स्मरण रखना होगा की यदि हिन्दी आज भी ससम्मान भारतवर्ष की हृदयंगिनी है तो इस महाकार भवन की नींव में बदरीनाथ कपूर जैसे महान वरदपुत्रों की झुलसी हुई इंटें हैं, जो इसे चिरकाल तक महागाथा बनाए रखेंगी l जय हिंद, जय हिन्दी l

स्वामी विवेकानंद की १५०वीं जयंती पर-
जब संपूर्ण विश्व का यश-वैभव स्वामी विवेकानंद के चरणों पर लोट रहा था, तब उन्हें अपनी माँ भुवनेश्वरी देवी के लिए गंगा किनारे "एक छोटी सी कुटिया" भी बनवा ना पाने की असमर्थता कचोट रही थी l जगत कल्याण के लिए सन्यासी जीवन अपनाकर स्वयं अपना श्राद्ध कर चुके स्वामी जी अपनी मृत्यु के दो दिन पूर्व तक माँ की व्यवस्था के लिए चिंतित रहे l मात्र ३९ वर्ष की अल्पायु में जब उन्होने महासमाधि ली तब उनकी माता की आयु ६१ वर्ष थी l अपनी माँ के लिए एक छोटा सा मकान बनाने का स्वप्न अंततः अपूर्ण ही रह गया l ऐसी त्यागमूर्ति को जब प्रत्येक युवा का आदर्श होना चाहिए तब बाहरी वैचारिक और व्यावहारिक दिखावे को अपना आदर्श बनाते युवाओं के दुर्भाग्य पर समय भी मौन है l निश्चित ही स्वामी विवेकानंद की आत्मा आज भी "फौलादी रक्त" वाले उन सौ युवाओं की बाट जोह रही होगी जिनसे भारत का उद्धार होना था l
 

हम रोगी हैं, ये आप मत बताइए l हम पीड़ित हैं, ये भी मत बताइए l हम गये गुज़रे हैं, ये भी मत बताइए l ये सच यहाँ हर किसी को पता है l अगर बता सकते हैं तो हमें ये बताइए की हमारी शिराओं में बुद्ध, रामानुज, शंकराचार्य, विवेकानंद, अरबिंदो, गाँधी, सुभाष, तिलक और आज़ाद जैसे हाड़-माँस के भारतीपुत्रों का सिंहनाद करता रक्त अब भी क्यूँ प्रवाहित हो रहा है ? जो एक क्षण के लिए भी ये भूलने नहीं देता की हम "कौन" हैं !! बताइए, कर सकते हैं ये ? किसी को सिखा सकते हैं, क़ि रोग की "चिंता" ना करके, स्वास्थ्य का "चिंतन" कैसे किया जाए ? यदि नहीं तो अपनी बुद्धिजीविता सुलगाकर औरों की तरह दो वक़्त की रोटी सेंकिए l "भारत" जानता है कि उसे क्या करना है l

मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी निर्मम है। वह सभ्यता और संस्क्रति के सभी मोहों को रौँदती चली आ रही है। सब कुछ में मिलावट है, सब कुछ अविशुद्ध है। यदि आज भी कुछ विशुद्ध है, तो वह है मनुष्य की दुर्दम इच्छाशक्ति। इसी इच्छाशक्ति ने न जाने कितने धर्माचारों, विश्वासों, उत्सवों और व्रतों को जन्म दिया, पल्लवित किया और क्षण भर में धूल धुसरित कर दिया। इस इच्छाशक्ति को "मुँशी जी" की कलम में देखा जा सकता है। "गोदान" इसका साक्षात उदाहरण है।

जिनका "वाद" और "पन्थ" उनकी दाढ़ी,कुर्ते,झोले-झण्डे में रहता है, उनके वास्ते-

जब अन्तर न रह जाए
कविता करने और साबुन से नहाने में,
जब एक ही बात हो
टीस सहने और घाव दिखाने में,
जब भूख मिटने लगे
रोटी देखने और कागज खाने में;

बस तभी,
कल्लू बनिये की दुकान के पिछवाड़े
चुपके से रात में हो जाती है क्रान्ति !
लंगड़ा पिल्ला कुकुआता है रात भर
लहू सा जब सूखता है लाल अँधेरा ;
सुबह बिछड़ जाते हैं पूँजी के दोराहे पर
राज्य और क्रान्ति, खुशी-खुशी गले मिलकर,
दिन भर, दुरदुराहट की चिंगारियाँ
समेटेगा वो, कुर्ते की फटी जेबों में
रात में फिर होनी है वही क्रान्ति !!

वो बूढ़े दरख्त का, जवान पत्ता है
हवाओं के साथ भटकता है दर-ब-दर;
शाख के छोड़ने या छूट जाने के बाद !!
कौन कहता है कि,ज़िन्दग़ी छोटी है ? कतई नहीं। हम इसे संभावनाओं की कसौटी पर नाप सकते हैं। यक़ीन मानिए, अगर आपमें “अपने होने की वजह को” आख़िरी बूँद तक निचोड़ सकने का जज्बा है, तो हर दिन के बाद आने वाली रात को आप ख़ामोशी से गुनगुनाकर, आरामकुर्सी पर बादलों वाले चाँद को निहारते हुए वैसे ही आदतन बिता सकते हैं जैसे चावल में कंकड़ मिलाने वाला सेठ। शर्त केवल इतनी ही है कि, “मैं या कि देश”? यह प्रश्न हर साँस के साथ हममें ज़िन्दा है कि नहीं?... आख़िर जिस सोने के कँगूरे पर हमें नाज़ है, उसकी नींव में खुद की मरज़ी से झोंकी गईं अनगिनत ईंटों को जवाब देना है कि नहीं !!!
Manikant Suman भाई की इन पंक्तियों की बिजली आप भी महसूस कीजिए..


आज “विश्व धरोहर दिवस” है...

Mayank भईया, Vikas भाई, Armendra Amar भईया @Gaurav shukl, Gaurav भईया Vikas Gaur भाई और Sundaram Ojha ...ये सभी देश के विभिन्न हिस्सों से आए अलग-अलग चेहरे हैं। ऊपरी तौर पर किसी में कोई समानता नहीं लेकिन नज़र ज़रा सी पैनी कीजिए तो सबमें एक समानता है, और वो यह है कि “ये सभी शापित हैं”। इन सबको शाप मिला है कल्पना करने का, अनुभव करने का, ख़ुद के ख़िलाफ ख़ुद को मशविरा देने का। इन्हें शाप मिला है हर सड़क, हर गली और हर चौराहे की ख़ाक छानने का। ये बेबस हैं भूखी बस्तियों की भरी-पूरी संरचनाओं का जायज़ा लेने को या भीड़ से सूने गोल चक्करों की तरफ़ भटकने को। इन्हें शाप में ही तो मिली है भूख के ख़िलाफ भूखे बाज़ की शिद्दत और तबीयत में पानी सी बेरंगियत। ये जानते हैं कि, आदमी को जानवर बनाए बिना उससे जानवर सा काम लेना नामुमक़िन है और इसीलिए इनमें ताकत है इनकार करने की। ये इनकार करते हैं ख़ुद को जानवर बनाए जाने की हर साजिश के ख़िलाफ़, सिर उठाकर।
इन सभी में काबिलियत है आने वाली पीढ़ी का “स्वस्थ आदर्श” बनने की। ये सियाह रातों के जुगनू और काग़ज़ के कारिन्दे हैं। इन्हें सहेजना और संजोना हमारा काम है। इनका निश्छल विश्वास बचाना हमारा धर्म है। ये सभी शापित जुगनू हमारे दरकते मकानों की धरोहर और फिर उठ खड़े होने का यक़ीन हैं। य़ही हमारा वरदान और कल हैं।
गौरव शुक्ल की यह रचना इन सभी शापितों को समर्पित ...



कृष्ण, अर्जुन, गीता और महाभारत


                             युवा अंतर्मन का महाभारत
संसार को दो तरह से देखा जा सकता है।एक तो खुली आँखों से और दूसरे आँखें बंद कर के भी। जब इसे हम खुली आँखों से देखते हैं तो हमें धूल और धुएं से बना वो संसार दिखाई देता है जो अपनी ठोस सच्चाई के साथ हमारे सामने है। इस तरह के संसार में जिस एक चीज की कोई जगह नहीं वो है हमारी "कल्पना"। दूसरी तरफ मानव का जो मूलभूत और नैसर्गिक स्वभाव है वह है उसका "कल्पनाशील" होना। आपको जानकर आश्चर्य होगा की हम सब बंद आँखों से संसार को देखते हैं, क्योंकि यही एकमात्र तरीका है जिसमे हम न सिर्फ दुनिया को देखते हैं बल्कि बनाते भी हैं। "संसार" देखना और "अपना संसार" देखना दो बिल्कुल अलग स्थितियां हैं।यही कल्पनाशक्ति है जो हमारे संस्कारों से लेकर आविष्कारों तक प्रत्येक स्थान पर जननी का कार्य करती है।
किसी ने बंद आँखों से संसार देखा तो उसमे उसे बिजली का बल्ब दिखाई दिया, किसी को टेलीफोन, किसी को हवाई जहाज तो किसी को मोटर कार दिखी। परिणामतः यह सभी चीजें धूल  और धुएं से बने ठोस सच्चाई वाले संसार में भी देर सवेर दिखाई दीं।
मेरा प्रश्न है की जब कल्पना इतना सब कुछ करा सकती है तो एक महायुद्ध क्यों नहीं करा सकती जो अपने विभिन्न पात्रों के साथ "महाभारत" के नाम से जाना जाये ?
ध्यान दीजियेगा, आवश्यक नहीं की प्रत्येक मानव कल्पना सच हो ही। ऐसी बहुत सारी कल्पनाएं हैं जिनका वास्तविक जीवन से किसी तरह का कोई लेना देना नहीं। तो मेरा प्रश्न की महाभारत भी मानव कल्पना का एक सुंदर अविष्कार था यदि आपको विचलित कर रहा हो तो अच्छी बात है। करना भी चाहिए।
चलिए यदि संपूर्ण महाभारत पर प्रश्नचिन्ह लगते हैं तो बात लम्बी हो जाएगी इसलिए हम यहाँ महाभारत के ही एक अंश श्रीमदभागवत की चर्चा करेंगे -
मेरे कुछ प्रश्नों पर मेरे साथ विचार करिएगा -
प्रथम प्रश्न कि क्या गीता वास्तव में महाभारत का ही एक अंश है? और क्या इसके रचयिता "व्यास" ही थे अथवा बाद में गीता को एक क्षेपक के रूप में सम्मिलित कर लिया गया?
द्वितीय प्रश्न कि क्या कृष्ण और अर्जुन नामक कोई एतिहासिक पुरुष थे भी?
तृतीय प्रश्न जिस कुरुक्षेत्र के युद्ध को आधार बनाकर गीता को उपदेशित किया गया वह युद्ध हुआ भी था या नहीं?
और चौथा प्रश्न कि  गीता का संपूर्ण चरित्र चित्रण कितनी एतिहासिक महत्ता रखता है?
अब मेरे इन प्रश्नों के आधार की भी जाँच पड़ताल की जाए  कि इन प्रश्नों का कोई आधार भी बनता है या यह भी कल्पनाशक्ति का ही परिणाम है?
आपको ज्ञात होगा कि जैसे "विक्रमादित्य" कोई नाम नहीं बल्कि उपाधि मात्र थी। वैसे ही "व्यास" कोई व्यक्ति विशेष सूचक नाम नहीं था अपितु एक उपाधि मात्र थी। उस समय जो भी किसी नए पुराण की रचना करता था उसे व्यास की उपाधि सम्मानपूर्वक दी जाती थी। तो गीता का लेखक कौन है? बादरायण व्यास, अपरायन  व्यास, या कोई और व्यास। और गीता के  विषय में तो लोगों को जानकारी  नहीं थी जब तक शंकराचार्य ने उस पर अपना महान भाष्य लिखकर उसे विख्यात नहीं बना दिया।
जहाँ तक दूसरा प्रश्न है कि कृष्ण है या नहीं? तो छन्दोग्योपनिषद में एक जगह हमें देवकी के पुत्र कृष्ण का उल्लेख मिलता है जिन्होंने घोर नामक योगी से आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की थी। विष्णुपुराण में कृष्ण तथा गोपियों का लीला वर्णन मिलता है। लेकिन महाभारत वाले कृष्ण तो द्वारकाधीश हैं इसीलिए बहुत सम्भव है कृष्ण का व्यक्तित्व इसी तरह की जोड़ तोड़ का परिणाम हो। 
क्षीर-सागर, इक्षु-सागर, घृत-सागर, तथा दधि-सागर जैसी मस्तिष्क की काल्पनिक सृष्टियों की तरह ही महाभारत के पात्रों की आयु कहीं दस हज़ार वर्ष तो कहीं एक लाख वर्ष बताई गयी है। किन्तु हमारे वेद कहते हैं - "शातायुवे पुरुषः" अर्थात मनुष्य कि आयु सौ वर्ष की है। अतः कल्पनाशक्ति के इस मायावी जाल में कृष्ण के बिषय में कोई सही निष्कर्ष नहीं निकलता।
अब तीसरा प्रश्न लें जो कुरुक्षेत्र के युद्ध से सम्बंधित है तो प्राचीन सैन्य विज्ञान के अध्ययन से ऐसा जान पड़ता है की रणक्षेत्र में जहाँ विशाल सेना व्यूह्बद्द खड़ी हो और लड़ने के लिए केवल एक शंखनाद की प्रतीक्षा कर रही हो वहां ज्ञान, भक्ति  और योग के विषय में इतनी वृहद् चर्चा कैसे हो सकती है? और यदि कृष्णार्जुन संवाद हुआ भी था तो क्या उनके प्रत्येक शब्द को लिखने के लिए कोई शीघ्रलिपिक वहां उपस्थित था? क्यूंकि गीता की भाषा देखकर तो यही लगता है।  क्योंकि गीता की भाषा देखकर तो यही लगता है की यह एक "तात्कालिक संभाषण" था।
अब आप पूछ सकते हैं की सदियों से चली आ रहीं इन पौराणिक गाथाओं के ऐतिहासिक शोध से क्या लाभ?
तो मेरा उत्तर होगा कि लाभ है, क्योंकि सत्य का पता लगाना उसका अस्तित्व होने से भी अधिक आवश्यक है। 
यदि गीता सहित महाभारत पर प्रश्न उठ भी जाये तो विश्व में  कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो श्रीमद  भागवत के "अनासक्त भाव" पर प्रश्न उठा सके। संपूर्ण विश्व के धर्म और दर्शन जिन प्रश्नों का उत्तर ढूँढते हुए लुप्त हो गए। उन्हीं प्रश्नों के समक्ष सूर्य की भांति  दीप्तिमान गीता आज भी अक्षुण् है। प्रोटेगेरा  से सुकरात और  बुद्ध  से महावीर तक की यात्रा का कहीं अंत नहीं  हुआ परन्तु गीता आज भी नीर  क्षीर विवेक प्रदान करने वाली अतिमानस की शक्ति बनी हुई है।
यदि पांडवों के दूत बनकर आये श्री कृष्ण  से दुर्योधन ने यह ना कहा होता की "मैं सुई की नोक के बराबर भी भूमि पांडवों को देने के लिए तैयार नहीं" तो कदाचित महाभारत का युद्ध भी न होता। राजा पान्डु  के पुत्र होने के कारण  बराबर का अधिकार पांडवों को था और उसी की प्राप्ति के लिए महासमर हुआ। अब यदि महाभारत के इस युद्ध को हम मात्र एक रूपक मान लें तो इसे हम अधिक उपयोगी एवं वृहत्तर रूप में समझ सकते हैं। महाभारत कोई एक युद्ध नहीं था जो हुआ और समाप्त हो गया। या हर सुबह सोकर उठने  से लेकर रात को फिर से सोने तक होने वाला वह युद्ध है  जो प्रतिक्षण हमारे स्वयं के भीतर की दैवीय  और आसुरी प्रवृत्तियों  के बीच होता रहता है। आजीवन और आमरण का महाभारत, क्या इसी युद्ध की कल्पना नहीं की गयी होगी? जिसका बाद में चरित्र चित्रण कर दिया होगा?
हमारी दैवीय प्रवृत्ति अपना स्वाभाविक अधिकार मांगती है और आसुरी  प्रवृत्तियाँ स्वभावतः दुर्योधन की भांति कृष्ण को जवाब देती हैं, और तभी प्रारंभ होता है स्वयं के अस्तित्व और अधिकार के लिए लड़ा जाने वाला महासमर। जिसमें एक तरफ होता है किन्कर्त्व्यविमूढ़ अर्जुन तो दूसरी तरफ होता है "जानामि धर्मे न च में प्रवृत्ती " की सोच वाला दुर्योधन, और कृष्ण , वो कहाँ हैं!! आप हैं! जी हाँ आप स्वयं ही हैं कृष्ण , क्योंकि  आदेश तो आपको ही  देना होगा।  आसक्त होकर या अनासक्त होकर। दोनों ही प्रवृत्तियाँ बराबर की शक्ति लेकर एक दूसरे  के समक्ष  खड़ी  हैं  और आपके हर निर्णय से सत्य की जीत या हार तय होती है। आश्चर्यचकित  मत होइएगा यदि आपको यह पता चले की दिन भर में सैकड़ों ही बार आपके ह्रदय में महाभारत होता रहता है और आपको  पता भी नहीं चलता कि  पांडव  जीते या कौरव? अपने लिए लिया गया हर निर्णय आपके भीतर  चल रहे महाभारत का परिणाम तय कर देता है और साथ तय कर देता है आपकी जीत या हार !!
मैं यहाँ भारत के युवा से संवाद कर रहा हूँ और मुझे पूरा विश्वास है कि भारतीय युवा न तो दिग्भ्रमित है न ही कुसंस्करित क्योंकि उसकी नसों में शंकराचार्य, महावीर, रामानुज, विवेकानंद, महर्षि रमण, गौतम बुद्ध, महाराणा प्रताप और महात्मा गाँधी का रक्त प्रवाहित हो रहा है जो इन्हें कई हज़ार वर्षों तक क्षण भर के लिए भी यह नहीं भूलने देगा की वो "भारतीय" हैं।
बस हमारा युवा वर्ग पूरब और पश्चिम की इस महाभारत में सही निर्णय नहीं ले पा रहा और सही निर्णय क्या हो यह भी तय करने वाला कोई और नहीं वह स्वयं है क्योंकि अन्ततः लडाई तो उसकी अपनी है और साथ ही जीत हर भी उसकी अपनी है। और जब तक उसके पूर्वजों के द्वारा दिया गया विवेक वह स्वयं विकसित नहीं करते तब तक उसे इसका दुष्परिणाम भुगतना ही होगा। इसका कोई विकल्प है ही नहीं।
जब जब हमारा युवा अपना धर्मयुद्ध महाभारत हारेगा तब तक किसी न किसी शहर में सामूहिक बलात्कार दिनदहाड़े होगा और पूरा देश शर्मसार होगा। जैसे युद्ध मात्र एक दिन के धरना प्रदर्शन और आगजनी से नहीं जीते जाते वैसे ही आप यह चार दिन का प्रदर्शन करके कुछ प्राप्त नहीं कर सकते जो ठोस हो।निर्णय आपका नहीं है। आप केवल स्वयं का निर्णय ले सकते हैं क्योंकि आप स्वयं की महाभारत के कृष्ण हैं।
परिवर्तन अवश्यंभावी है परन्तु उस तरह का नहीं जैसा आप चाहते हैं। आप कह रहे हैं की कानून सख्त हो। क्या आपने संविधान और भारतीय दण्ड अधिनियम का अध्ययन किया है? यदि हाँ तो बताइये इसमें कमी कहाँ है? आप खाड़ी  देशों का उदाहरण  दे रहे हैं की उनकी तरह बीच चौराहे पर गोली मरो। मगर क्या आपने कभी इन देशों की अपराध सारिणी को ध्यान  से देखा है? यदि हाँ तो आपको पता होगा की सबसे ज्यादा औरतों की खरीद फरोख्त और इनसे जुड़े अपराध वहीँ पर हो रहे हैं। अन्तर केवल इतना है की वो आपसे ज्यादा शातिर हैं।
महाभारत जारी  है - नए पुराने के बीच, अच्छे बुरे के बीच, सही गलत के बीच और न जाने किस किस के बीच। सड़क पर चलते, धूल धुआं खाते गटकते हर क्षण जारी है एक महाभारत आपके भीतर। आवश्यकता है तो केवल उसे चेतन मन से लड़ने और जीतने की।
क्योंकि जब जब किसी ने अपने भीतर का महाभारत जीता तब तब एक "बीना कालिन्दी" पैदा हुई जो मात्र 17 साल की उम्र में बाल विवाह के विरुद्ध आन्दोलन करते हुए 17 बार जेल गयी। जब जब इस युद्ध को सही निर्णय एवं दिशा मिली तब तब कहीं न कहीं एक "नीलेश भट्ट" पैदा हुआ जिसने स्वयं मजदूर होते हुए भी खनन माफियाओं के विरुद्ध आवाज़ उठाई और अपना एक पैर खो दिया। 
यह याद रखिये कि आपका एक सही निर्णय इस धर्मयुद्ध में आपकी मौत को देश के लिए शहादत बना सकता है जो आपकी तरह ही फिर किसी युवा को उसका महाभारत जीतने में मदद करेगी। देश को सिंहनाद करती गीता के उस पाठ की महती आवश्यकता है जो यह सिखाता है कि- 

क्लैब्यं मास्मगमः पार्थ नैतत्वयुपपद्यते !!
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्याक्त्वोतिष्ठ्म परन्तप !!3!!

विश्व भर में भारतीय ज्ञान और दर्शन की विजय पताका फ़हराने वाले युगपुरुष स्वामी विवेकानंद की 150वें जन्मदिवस पर स्वामी जी द्वारा कहे गए इन्ही शब्दों के साथ अपनी वाणी को विराम दूंगा कि -
"एक मच्छर यह कभी नहीं समझ सकता कि हाथी में कितना बल है? हाथी का बल जानने के लिए उसे शेर बनना पड़ेगा। इसीलिए यदि तुम वास्तव में भारत और इसकी अध्यात्मिक सम्पदा को जानना, समझना चाहते हो तो पहले अपना इतिहास जानो और फिर स्वयं में शेर का सा बल ले आओ। तत्पश्चात तुम्हे स्वयं पता चल जाएगा कि विश्व को देने के लिए तुम्हारे पास क्या है!!