युवा अंतर्मन का महाभारत
संसार को दो तरह से देखा जा सकता है।एक तो खुली आँखों से और दूसरे आँखें बंद कर के भी। जब इसे हम खुली आँखों से देखते हैं तो हमें धूल और धुएं से बना वो संसार दिखाई देता है जो अपनी ठोस सच्चाई के साथ हमारे सामने है। इस तरह के संसार में जिस एक चीज की कोई जगह नहीं वो है हमारी "कल्पना"। दूसरी तरफ मानव का जो मूलभूत और नैसर्गिक स्वभाव है वह है उसका "कल्पनाशील" होना। आपको जानकर आश्चर्य होगा की हम सब बंद आँखों से संसार को देखते हैं, क्योंकि यही एकमात्र तरीका है जिसमे हम न सिर्फ दुनिया को देखते हैं बल्कि बनाते भी हैं। "संसार" देखना और "अपना संसार" देखना दो बिल्कुल अलग स्थितियां हैं।यही कल्पनाशक्ति है जो हमारे संस्कारों से लेकर आविष्कारों तक प्रत्येक स्थान पर जननी का कार्य करती है। किसी ने बंद आँखों से संसार देखा तो उसमे उसे बिजली का बल्ब दिखाई दिया, किसी को टेलीफोन, किसी को हवाई जहाज तो किसी को मोटर कार दिखी। परिणामतः यह सभी चीजें धूल और धुएं से बने ठोस सच्चाई वाले संसार में भी देर सवेर दिखाई दीं। मेरा प्रश्न है की जब कल्पना इतना सब कुछ करा सकती है तो एक महायुद्ध क्यों नहीं करा सकती जो अपने विभिन्न पात्रों के साथ "महाभारत" के नाम से जाना जाये ? ध्यान दीजियेगा, आवश्यक नहीं की प्रत्येक मानव कल्पना सच हो ही। ऐसी बहुत सारी कल्पनाएं हैं जिनका वास्तविक जीवन से किसी तरह का कोई लेना देना नहीं। तो मेरा प्रश्न की महाभारत भी मानव कल्पना का एक सुंदर अविष्कार था यदि आपको विचलित कर रहा हो तो अच्छी बात है। करना भी चाहिए। चलिए यदि संपूर्ण महाभारत पर प्रश्नचिन्ह लगते हैं तो बात लम्बी हो जाएगी इसलिए हम यहाँ महाभारत के ही एक अंश श्रीमदभागवत की चर्चा करेंगे - मेरे कुछ प्रश्नों पर मेरे साथ विचार करिएगा - प्रथम प्रश्न कि क्या गीता वास्तव में महाभारत का ही एक अंश है? और क्या इसके रचयिता "व्यास" ही थे अथवा बाद में गीता को एक क्षेपक के रूप में सम्मिलित कर लिया गया? द्वितीय प्रश्न कि क्या कृष्ण और अर्जुन नामक कोई एतिहासिक पुरुष थे भी? तृतीय प्रश्न जिस कुरुक्षेत्र के युद्ध को आधार बनाकर गीता को उपदेशित किया गया वह युद्ध हुआ भी था या नहीं? और चौथा प्रश्न कि गीता का संपूर्ण चरित्र चित्रण कितनी एतिहासिक महत्ता रखता है?
अब मेरे इन प्रश्नों के आधार की भी जाँच पड़ताल की जाए कि इन प्रश्नों का कोई आधार भी बनता है या यह भी कल्पनाशक्ति का ही परिणाम है? आपको ज्ञात होगा कि जैसे "विक्रमादित्य" कोई नाम नहीं बल्कि उपाधि मात्र थी। वैसे ही "व्यास" कोई व्यक्ति विशेष सूचक नाम नहीं था अपितु एक उपाधि मात्र थी। उस समय जो भी किसी नए पुराण की रचना करता था उसे व्यास की उपाधि सम्मानपूर्वक दी जाती थी। तो गीता का लेखक कौन है? बादरायण व्यास, अपरायन व्यास, या कोई और व्यास। और गीता के विषय में तो लोगों को जानकारी नहीं थी जब तक शंकराचार्य ने उस पर अपना महान भाष्य लिखकर उसे विख्यात नहीं बना दिया। जहाँ तक दूसरा प्रश्न है कि कृष्ण है या नहीं? तो छन्दोग्योपनिषद में एक जगह हमें देवकी के पुत्र कृष्ण का उल्लेख मिलता है जिन्होंने घोर नामक योगी से आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की थी। विष्णुपुराण में कृष्ण तथा गोपियों का लीला वर्णन मिलता है। लेकिन महाभारत वाले कृष्ण तो द्वारकाधीश हैं इसीलिए बहुत सम्भव है कृष्ण का व्यक्तित्व इसी तरह की जोड़ तोड़ का परिणाम हो।
क्षीर-सागर, इक्षु-सागर, घृत-सागर, तथा दधि-सागर जैसी मस्तिष्क की काल्पनिक सृष्टियों की तरह ही महाभारत के पात्रों की आयु कहीं दस हज़ार वर्ष तो कहीं एक लाख वर्ष बताई गयी है। किन्तु हमारे वेद कहते हैं - "शातायुवे पुरुषः" अर्थात मनुष्य कि आयु सौ वर्ष की है। अतः कल्पनाशक्ति के इस मायावी जाल में कृष्ण के बिषय में कोई सही निष्कर्ष नहीं निकलता।
अब तीसरा प्रश्न लें जो कुरुक्षेत्र के युद्ध से सम्बंधित है तो प्राचीन सैन्य विज्ञान के अध्ययन से ऐसा जान पड़ता है की रणक्षेत्र में जहाँ विशाल सेना व्यूह्बद्द खड़ी हो और लड़ने के लिए केवल एक शंखनाद की प्रतीक्षा कर रही हो वहां ज्ञान, भक्ति और योग के विषय में इतनी वृहद् चर्चा कैसे हो सकती है? और यदि कृष्णार्जुन संवाद हुआ भी था तो क्या उनके प्रत्येक शब्द को लिखने के लिए कोई शीघ्रलिपिक वहां उपस्थित था? क्यूंकि गीता की भाषा देखकर तो यही लगता है। क्योंकि गीता की भाषा देखकर तो यही लगता है की यह एक "तात्कालिक संभाषण" था।
अब आप पूछ सकते हैं की सदियों से चली आ रहीं इन पौराणिक गाथाओं के ऐतिहासिक शोध से क्या लाभ?
तो मेरा उत्तर होगा कि लाभ है, क्योंकि सत्य का पता लगाना उसका अस्तित्व होने से भी अधिक आवश्यक है।
यदि गीता सहित महाभारत पर प्रश्न उठ भी जाये तो विश्व में कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो श्रीमद भागवत के "अनासक्त भाव" पर प्रश्न उठा सके। संपूर्ण विश्व के धर्म और दर्शन जिन प्रश्नों का उत्तर ढूँढते हुए लुप्त हो गए। उन्हीं प्रश्नों के समक्ष सूर्य की भांति दीप्तिमान गीता आज भी अक्षुण् है। प्रोटेगेरा से सुकरात और बुद्ध से महावीर तक की यात्रा का कहीं अंत नहीं हुआ परन्तु गीता आज भी नीर क्षीर विवेक प्रदान करने वाली अतिमानस की शक्ति बनी हुई है।
यदि पांडवों के दूत बनकर आये श्री कृष्ण से दुर्योधन ने यह ना कहा होता की "मैं सुई की नोक के बराबर भी भूमि पांडवों को देने के लिए तैयार नहीं" तो कदाचित महाभारत का युद्ध भी न होता। राजा पान्डु के पुत्र होने के कारण बराबर का अधिकार पांडवों को था और उसी की प्राप्ति के लिए महासमर हुआ। अब यदि महाभारत के इस युद्ध को हम मात्र एक रूपक मान लें तो इसे हम अधिक उपयोगी एवं वृहत्तर रूप में समझ सकते हैं। महाभारत कोई एक युद्ध नहीं था जो हुआ और समाप्त हो गया। या हर सुबह सोकर उठने से लेकर रात को फिर से सोने तक होने वाला वह युद्ध है जो प्रतिक्षण हमारे स्वयं के भीतर की दैवीय और आसुरी प्रवृत्तियों के बीच होता रहता है। आजीवन और आमरण का महाभारत, क्या इसी युद्ध की कल्पना नहीं की गयी होगी? जिसका बाद में चरित्र चित्रण कर दिया होगा?
हमारी दैवीय प्रवृत्ति अपना स्वाभाविक अधिकार मांगती है और आसुरी प्रवृत्तियाँ स्वभावतः दुर्योधन की भांति कृष्ण को जवाब देती हैं, और तभी प्रारंभ होता है स्वयं के अस्तित्व और अधिकार के लिए लड़ा जाने वाला महासमर। जिसमें एक तरफ होता है किन्कर्त्व्यविमूढ़ अर्जुन तो दूसरी तरफ होता है "जानामि धर्मे न च में प्रवृत्ती " की सोच वाला दुर्योधन, और कृष्ण , वो कहाँ हैं!! आप हैं! जी हाँ आप स्वयं ही हैं कृष्ण , क्योंकि आदेश तो आपको ही देना होगा। आसक्त होकर या अनासक्त होकर। दोनों ही प्रवृत्तियाँ बराबर की शक्ति लेकर एक दूसरे के समक्ष खड़ी हैं और आपके हर निर्णय से सत्य की जीत या हार तय होती है। आश्चर्यचकित मत होइएगा यदि आपको यह पता चले की दिन भर में सैकड़ों ही बार आपके ह्रदय में महाभारत होता रहता है और आपको पता भी नहीं चलता कि पांडव जीते या कौरव? अपने लिए लिया गया हर निर्णय आपके भीतर चल रहे महाभारत का परिणाम तय कर देता है और साथ तय कर देता है आपकी जीत या हार !!
मैं यहाँ भारत के युवा से संवाद कर रहा हूँ और मुझे पूरा विश्वास है कि भारतीय युवा न तो दिग्भ्रमित है न ही कुसंस्करित क्योंकि उसकी नसों में शंकराचार्य, महावीर, रामानुज, विवेकानंद, महर्षि रमण, गौतम बुद्ध, महाराणा प्रताप और महात्मा गाँधी का रक्त प्रवाहित हो रहा है जो इन्हें कई हज़ार वर्षों तक क्षण भर के लिए भी यह नहीं भूलने देगा की वो "भारतीय" हैं।
बस हमारा युवा वर्ग पूरब और पश्चिम की इस महाभारत में सही निर्णय नहीं ले पा रहा और सही निर्णय क्या हो यह भी तय करने वाला कोई और नहीं वह स्वयं है क्योंकि अन्ततः लडाई तो उसकी अपनी है और साथ ही जीत हर भी उसकी अपनी है। और जब तक उसके पूर्वजों के द्वारा दिया गया विवेक वह स्वयं विकसित नहीं करते तब तक उसे इसका दुष्परिणाम भुगतना ही होगा। इसका कोई विकल्प है ही नहीं।
जब जब हमारा युवा अपना धर्मयुद्ध महाभारत हारेगा तब तक किसी न किसी शहर में सामूहिक बलात्कार दिनदहाड़े होगा और पूरा देश शर्मसार होगा। जैसे युद्ध मात्र एक दिन के धरना प्रदर्शन और आगजनी से नहीं जीते जाते वैसे ही आप यह चार दिन का प्रदर्शन करके कुछ प्राप्त नहीं कर सकते जो ठोस हो।निर्णय आपका नहीं है। आप केवल स्वयं का निर्णय ले सकते हैं क्योंकि आप स्वयं की महाभारत के कृष्ण हैं।
परिवर्तन अवश्यंभावी है परन्तु उस तरह का नहीं जैसा आप चाहते हैं। आप कह रहे हैं की कानून सख्त हो। क्या आपने संविधान और भारतीय दण्ड अधिनियम का अध्ययन किया है? यदि हाँ तो बताइये इसमें कमी कहाँ है? आप खाड़ी देशों का उदाहरण दे रहे हैं की उनकी तरह बीच चौराहे पर गोली मरो। मगर क्या आपने कभी इन देशों की अपराध सारिणी को ध्यान से देखा है? यदि हाँ तो आपको पता होगा की सबसे ज्यादा औरतों की खरीद फरोख्त और इनसे जुड़े अपराध वहीँ पर हो रहे हैं। अन्तर केवल इतना है की वो आपसे ज्यादा शातिर हैं।
महाभारत जारी है - नए पुराने के बीच, अच्छे बुरे के बीच, सही गलत के बीच और न जाने किस किस के बीच। सड़क पर चलते, धूल धुआं खाते गटकते हर क्षण जारी है एक महाभारत आपके भीतर। आवश्यकता है तो केवल उसे चेतन मन से लड़ने और जीतने की।
क्योंकि जब जब किसी ने अपने भीतर का महाभारत जीता तब तब एक "बीना कालिन्दी" पैदा हुई जो मात्र 17 साल की उम्र में बाल विवाह के विरुद्ध आन्दोलन करते हुए 17 बार जेल गयी। जब जब इस युद्ध को सही निर्णय एवं दिशा मिली तब तब कहीं न कहीं एक "नीलेश भट्ट" पैदा हुआ जिसने स्वयं मजदूर होते हुए भी खनन माफियाओं के विरुद्ध आवाज़ उठाई और अपना एक पैर खो दिया।
यह याद रखिये कि आपका एक सही निर्णय इस धर्मयुद्ध में आपकी मौत को देश के लिए शहादत बना सकता है जो आपकी तरह ही फिर किसी युवा को उसका महाभारत जीतने में मदद करेगी। देश को सिंहनाद करती गीता के उस पाठ की महती आवश्यकता है जो यह सिखाता है कि-
क्लैब्यं मास्मगमः पार्थ नैतत्वयुपपद्यते !!
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्याक्त्वोतिष्ठ्म परन्तप !!3!!
विश्व भर में भारतीय ज्ञान और दर्शन की विजय पताका फ़हराने वाले युगपुरुष स्वामी विवेकानंद की 150वें जन्मदिवस पर स्वामी जी द्वारा कहे गए इन्ही शब्दों के साथ अपनी वाणी को विराम दूंगा कि -
"एक मच्छर यह कभी नहीं समझ सकता कि हाथी में कितना बल है? हाथी का बल जानने के लिए उसे शेर बनना पड़ेगा। इसीलिए यदि तुम वास्तव में भारत और इसकी अध्यात्मिक सम्पदा को जानना, समझना चाहते हो तो पहले अपना इतिहास जानो और फिर स्वयं में शेर का सा बल ले आओ। तत्पश्चात तुम्हे स्वयं पता चल जाएगा कि विश्व को देने के लिए तुम्हारे पास क्या है!!
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