सोशल मीडियाः रंग अनछुए हैं अभी कुछ
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सुमित सिंह दीक्षित
“मै अकेला रहता हूँ, इसे आप मेरी बहादुरी समझ सकते
हैं। लेकिन जिस तरह ज़मीन पर सोने वाले को पलंग से गिरने का डर नहीं होता उसी तरह
मै जब तक अकेला हूँ, मुझे किसी का डर नहीं”- जर्मन साहित्यकार फ्रांज काफ्का की डायरी से।
सोशल
नेटवर्किंग पर इतना कुछ
लिखा और बोला गया है कि ऊपरी तौर से सोचने पर ऐसा जान पड़ता है कि जैसे अब किसी भी
कोण से सोचने को कुछ भी बाकी ही नहीं रह गया है। लगता है जैसे तस्वीर के हर रंग और
पक्ष की पूर्ण विवेचना हो चुकी है। मजेदार बात यह है कि अभी भी पुराने किस्सों का
ही पुनरुत्पादन किया जा रहा है। चाहे वह मिस्र और ट्यूनीशिया हों या युवा और अन्ना
हजारे। हर जगह सोशल नेटवर्किंग को एक अद्भुत हथियार के रूप में वर्णित किया जा रहा
है, यह अलग बात है कि कुछ इसे सकारात्मक कहते हैं तो कुछ
नकारात्मक।
लेकिन इस तथ्य
पर सार्थक बहसें बहुत कम देखी गयी हैं कि महज कुछ वर्ष पहले अवतरित फेसबुक जैसी
साइट्स किस कारण से चीन और भारत के बाद सबसे अधिक जनसंख्या वाली "आभासी
राष्ट्र" बन गई। पचपन करोड़ से भी ज्यादा उपयोगकर्ताओं के साथ यह एक ऐसी शक्ति
बन कर उभरी है जिसकी क्षमता पर कोई प्रश्न ही नहीं उठता, लेकिन कारण क्या है?
आज यदि सोशल नेटवर्किंग साइटों पर उमड़े इस जनसमुदाय को एक “आभासी समाज” मान लिया जाए तो
इसकी उत्पत्ति और विकास के मूल तक जाने में सुविधा होगी। ऑस्ट्रियन
चित्रकार कोकोश्का ने एक बार कहा था- “अकेलेपन के कारण ही मनुष्य ने समाज की अवधारणा की होगी, लेकिन इस सत्य ने कि, हर समाज एक यूटोपिया है, उसे दोबारा से अपने अकेलेपन में शरण पाने लिए बाध्य किया होगा” ।
वृहदारण्यक उपनिषद का जीववाद, गौतम बुद्ध
का सम्यकवाद, शंकर का
मायावाद, रामानुज
और वल्लभ का ब्रह्मसूत्र भाष्य इन सभी से लेकर कार्ल मार्क्स का द्वंदात्मक भौतिकवाद, काडवेल और राल्फ का वर्गसंघर्ष और गांधी की अहिंसा ये सभी मनुष्य
के एकाकीपन को ही कहीं न कहीं परिभाषित तो करती हैं परन्तु उसका
हल नहीं सुझातीं। अर्थात अकेलेपन से प्रारम्भ हुई यात्रा फिर उसे अकेलेपन तक ले आती
है। चाहे कोई कुछ भी तर्क दे परन्तु यह सत्य है कि सोशल नेट्वर्किंग
साइट्स पूर्णरूपेण मनुष्य के एकाकीपन से ही जीवित हैं और दिन-प्रतिदिन इनका फैलाव ही हो रहा है। यदि फेसबुक का बारीकी से निरीक्षण करें तो हमें एक ऐसा तत्व मिलेगा जो सभी वर्ग
के उपयोगकर्ताओं में नियमित है और वह है उसकी “आक्रामकता”। यह किसी भी तत्व को लेकर हो सकती है, चाहे वह कोई
वाद हो या धर्म हो या पंथ हो या विचारधारा हो- सभी अप्रत्याशित रूप से आक्रामक हैं; और प्रख्यात
मनोवैज्ञानिक फ्रायड ने कुंठा-आक्रमण (frustration-aggression) सिद्धान्त का विकास किया। उसने यह बताया कि आक्रामकता
की उपस्थिति, कुंठा की उपस्थिति का स्पष्ट संकेत करती है।
“मिलर” ने भी यही विचार दिया है की व्यक्ति में आक्रामक व्यवहार कितनी मात्रा में होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसका
कुंठा-प्रयुत्तर
(frustration-reaction) कितना शक्तिशाली है और इसी दिशा में फ्रायड के शिष्य रहे ऍडलर तथा
जुंग इस बात की पुष्टि करते हैं कि व्यक्ति का तनाव कम या समाप्त तभी होता है जब
वह अपनी आक्रामकता को व्यक्त कर लेता है। तो क्या हमारे तथाकथित क्रान्तिकारी युवा
समाज की यह सारी आक्रामकता उसकी कुंठा का परिणाम है? उत्तर हमें
“गोर्की” के कथा चरित्रों और “रिल्के” के पत्रों में मिलता है। मक्सिम
गोर्की के लगभग सभी कथा चरित्र नितांत और निजी अकेलेपन में जीवन यापन करते हैं, परन्तु
वे आक्रामक नहीं हैं वे अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्ष जरूर करते हैं, परन्तु व्यर्थ की
आक्रामकता से नहीं बल्कि शक्तिशाली और अधिकारप्राप्त वर्ग की सत्ता के साथ चलते हुए।
हमारा अधिकांश फेसबुकिया
वर्ग विरोध करता है लेकिन किसलिए? केवल अपनी शक्ति और सामर्थ्य साबित करने के लिए?
दूसरा सबसे बड़ा कारण है इस विशाल जनसंख्या की अभिव्यक्ति! सभी के पास अपनी अपनी अनुभूति है, आइसक्रीम
खाने से लेकर भ्रष्टाचारियों के धन खाने तक, और हर कोई
अपनी नितांत निजी अनुभूति को एक ऐसे चरम बिन्दु तक खींच ले
जाना चाहता है, जहां वह, “सार्वजनिक
कर्म” बने बिना भी, दुनिया की सतह पर एक प्रेत छाया की तरह प्रकट होती रहे। कुछ-कुछ उन दिवास्वप्नों की तरह जिन्हें लोग सडकों पर
चलते हुए, बस की प्रतीक्षा
करते हुए या सिर्फ अकेले में बैठे हुए देखते रहते हैं। यहाँ नीत्शे की द्वंदात्मक भौतिकवाद
की परिकल्पना कितनी सटीक साबित होती है, कल्पना और सत्य के बीच द्वन्द्, स्वयं के अन्तरम् में द्वन्द्।
सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर आक्रामकता के खोल
में इस भय का व्यापार ही तो
हो रहा है, और वह भी स्वेछा से! “मास्लो” का “सामाजिक आवश्यकता का सिद्धांत” उल्टा पड़ रहा है और “व्यक्ति रोटी से रुतबे की तरफ नहीं बल्कि रुतबे
से रोटी की तरफ जा रहा है”।
“इतने लोग हैं, कुछ तो
होगा” जैसे सर्वव्यापी मनोवैज्ञानिक भ्रम के कारण हम सब सोशल
नेटवर्किंग के लिए टूट पड़े हैं। इलियट की कविताओं पर विद्यार्थियों की पीढ़ियों ने शोध किया तो
इनका कुछ तो अर्थ निकलता ही होगा। लेकिन
कल्पना कीजिये कि यदि इनका कोई अर्थ न निकलता हो तो? यदि ये
सारी कवितायें सिर्फ निर्जीव भ्रम कि वाहक हों तो? अँधेरे
में खड़े पेड़ पर किसी आकृति के होने का भ्रम, लम्बी घास
में सांप के सरकने का भ्रम और हम बार-बार वहां जाते हैं सिर्फ अपने इस भ्रम की पुष्टि
के लिए, उस “कुछ” को अनुभव करने।
वास्तव में हम दो दुनियाओं में जी रहे हैं; एक है दिन
की दुनिया, जो वास्तविकता
के प्रकाश से आलोकित है, और दूसरी है रात की दुनिया और इसी दुनिया में हम सभी जर्जरित
और बौने लोग, जो दिन के उजाले में दुरदुराये
जाते हैं, जो मुफ्त
होते हैं; हम सब अचानक अपनी और दूसरों की आँखों में कायाकल्पित हो
जाते है, समाज सेवियों, विचारकों, लेखकों
में बदल जाते हैं। अपनी पूरी शक्ति के साथ पृथ्वी की समस्त शक्तियों के संपर्क में
रहने वाले “सर्वशक्तिमान मानव”। और हमारा
इस तरह से अकेले कमरे में एक कम्प्यूटर के सामने परिवर्तित हो जाना कोई कला या सौंदर्यवादी
कर्म नहीं है। यह एक तरह का जादू है जो हमारे और इस प्रतिकूल दुनिया के बीच “मध्यस्थ” की तरह क्रियाशील रहता है। हम इसके
द्वारा एक ऐसी शांति पा लेते हैं जो हमारे “आतंक और आकांक्षाओं” पर कुछ समय के लिए ही सही परन्तु संतुष्टि का पर्दा तो डाल ही देती है ।जैसे धर्म मनुष्यों के लिए बना है, मनुष्य धर्म के लिए नहीं, ठीक वैसे ही फेसबुक
जैसी साइट्स का फॉर्मेट सोचने के लिए बना है, उस फॉर्मेट
के लिए हमारी सोच नहीं बनी। जैसे कि अध्ययन के पश्चात सामने आ रहा है, कि ये साइट्स
अपने- अपने खांचे में उपयोगकर्ताओं की सोच को नियत कर रही हैं-
क्यूंकि अपने अकेलेपन से लड़ने का साहस मुट्ठीभर लोगों
में ही होता है, क्यूंकि
अकेलेपन में आत्मनिरीक्षण सबके बस का नहीं। लेकिन हर व्यक्ति जानता है कि यह उतना ही
आवश्यक है जितना हृदय का धड़कना। तो क्यूँ न ऐसा करें की सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे।
लीजिये शुरू हो गई सोशल नेटवर्किंग, लाइक, कमेंट और शेयर
का खेल। आपको क्या लगता है कि करोड़ों
की भीड़ में हर कोई एक-दूसरे का
आंकलन, परीक्षण
कर रहा है? जी नहीं! भीड़ में हर कोई अपना-अपना आंकलन कर रहा है। यह
और बात है कि खुद को परखने की कसौटी उसने क्या तय की है?
हर सुबह एक लक्ष्य का उत्साह आपके भीतर हो ऐसा करने में
हमारे संसार की सारी शक्तियां, हमारे विकास, हमारे विज्ञान, हमारी सभ्यता द्वारा निर्मित सारी क्षमताएं और औजार असमर्थ हैं- यह क्षमता
केवल उस व्यक्ति में है जिसे आप शीशे के सामने आने पर देख पाते हैं, और आश्चर्यजनक
रूप से उद्देश्यहीन भीड़ में आप अपनी इस क्षमता में स्पष्ट ह्वास अनुभव करेंगे। अलबत्ता आपको इस उत्साह तक पहुंचाने के रास्ते सोशल नेटवर्किंग की सड़क के आस
पास से ही जाते हैं- ये वही रास्ते हैं जिन्हें जानने के लिए प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक और सामाजिक अवचेतना (social unconscious) के सिद्धांत का जन्मदाता कार्ल जुंग भारत आया, उसे अपना रास्ता मिला भारतीय दर्शन में, महर्षि रमण के द्वारा।
सवाल उठता है कि क्या कोई बेहतर उपाय हमारे पास है? अपने अकेलेपन
से लड़ने में जो सामाजिक, मानसिक, मूल्य हम चुका रहे हैं उसे बचाने का उपाय क्या है? श्रीमदभाग्वद्गीता के दूसरे अध्याय का 38वाँ श्लोक इसका उत्तर है-
“सुखदुखे समेकृत्वा, लाभालाभौ जयाजयौ;
ततो युद्धाय युज्यस्वम्, नैवं पापमवाप्स्यसि !!”
अर्थात सुख-दुःख में समान रहकर (बिना आक्रामकता के), लाभ-हानि तथा जय-पराजय की (वाद, पंथ, धारा से विरक्त) चिंता किये बिना जो भी इस युद्ध को लड़ेगा, वह लेशमात्र
भी पाप का भागी नहीं बनेगा।
इस उत्तर की मीमांसा आप पर छोड़ते हुए इतना अवश्य कहना चाहूँगा कि यवनिका उठती है और
गिर जाती है। किन्तु यवनिका का प्रत्येक आक्षेप, परदे का
प्रत्येक परिवर्तन, अपने अवसान
में लीन होकर भी नाटक के प्रवाह में एक बूँद और डाल जाता है। वही बूँद, जो स्वयं कुछ नहीं है किन्तु जिसके बिना उस प्रवाह में गति नहीं
आ सकती- जिसके बिना उसका अस्तित्व
ही नहीं हो सकता।
-सुमित
सिंह दीक्षित
संपादक
“युवा मन” (साहित्यिक पत्रिका)
270,
रामबाग, इलाहबाद, उत्तर प्रदेश