लोकाचार
लखनऊ
शहर में मुहर्रम की बड़ी धूम है l बड़ी मस्ज़िद - इमामबाड़े में सजावट और रौशनी की
बहार का तो कहना ही क्या l बेशुमार लोग आ-जा रहे हैं l हिंदू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी आदि अनेक जाति के स्त्री-पुरुषों
की भीड़ की भीड़ आज मुहर्रम देखने को एकत्रित हुई है। लखनऊ शिया लोगों की राजधानी
है । आज
हज़रत इमाम हुसैन के नाम का आर्तनाद आकाश को भी गुंजायमान कर रहा है । यह हृदय
दहलाने वाला मर्सिया, उसके साथ फूट-फूटकर रोना किसके हृदय को
द्रवित ना कर देगा भला । सहस्र वर्ष की प्राचीन करबला की कथा आज फिर जागृत हो उठी
थी ।
इन्ही दर्शकों की भीड़ में मनबहलाव तथा सजीव तमाशा देखने दूर के गाँव-गिराम से दो भद्र राजपूत भी चले आए थे । जैसा की प्रायः देहाती ज़मींदार लोग हुआ करते थे - ये दोनो भी निरक्षरभट्ट थे, अर्थात अँगूठाछाप थे l लखनऊ की इस्लामी सभ्यता, शीन-काफ का शुद्ध उच्चारण, शाइस्ता ज़ुबान, ढीली शेरवानी, चुस्त पायजामा और पगड़ी, रंग-बिरंगे कपड़ों का लिबास- ये सब आज भी दूर गाँव में प्रवेश कर वहाँ के ठाकुर लोगों को स्पर्श तक नहीं कर पाए थे। अतः ये ठाकुर लोग सरल और सीधे हैं और हमेशा जँवामर्द, चुस्त, मुस्तैद और मजबूत दिल वालों को ही पसंद करते हैं ।
दोनों ठाकुर साहब फाटक पार करके मस्जिद के अंदर प्रवेश करने ही वाले थे कि, कड़क मूँछों पर ताव देते हुए,लाल साफ़ा बाँधे सिपाही जी ने दोनों को अंदर जाने से मना कर दिया । जब ठाकुरों ने इसका कारण पूछा तो सिपाही जी ने उत्तर दिया," यह जो दरवाज़े के पास मूर्ति खड़ी देख रहे हो ना, उसे पहले तुम दोनों पाँच-पाँच जूते मारो, तभी अंदर जा सकोगे"!!!!!
दोनों ठाकुर किंकर्तव्यविमूढ़ होकर एक दूसरे का सूखा हुआ मुँह ताकने लगे।
मगर
उनमें से तेज़तर्रार ठाकुर ने बरसों से यूँही पड़े हुए दिमाग़ को धक्का देकर चलाया
और सिपाही जी को तनिक आँखें फैलाकर पूछा, “का हो सिपाही जी, ई लाल साफ़ा बाँध ल्यौ
और जरा पीतल के चमाचम कमरबन्द पे बूट कस ल्यौ तो हमन ठाकुरन के एकदमई नकारा समझ
ल्यौ का भाई। तुम्हरे जइसन इपाही-सिपाही सरवन हमार हुक्का भरत हैं। सम्झ्यौ की नाय
? ई मूर्ति है केकी और हम एका मारें काहे भाई । कसूर का है जी एका ?
सिपाही समझ गया कि ठाकूरसुहाती करनी ही पड़ेगी, सो ज़रा नरम होकर बोला – “ठाकुर साहेब, आपको तो हम देखते ही पहचान गये, अलबत्ता हम भी फौज से रेटार भए हैं और भवानी किरपा से देस खातिर एक लड़ाय भी लड़े मगर ठाकुर साहेब हम कौनो एम-टेम बात थोड़े ना बतियायन आप दूनौउन से ? अरे यही ई मेला के नियम है । अब आपई बताओ का हम काभौ नियम क़ानून से मुह फेर सकत हैं भला, तिस पर फ़ौजी ठहरे । भई ई मूर्ति जौन है ना, ई ससुरे महापापी येजीद की मूर्ति है । यही तो एक हज़ार साल पहिले मुहम्मद साहेब का कतल किए रहा और यही लिए तो ई सब आज का रोना धोना है बाबू साहेब” ।
सिपाही मन ही मन स्वयं के नवीं तक पढ़े होने के घमंड से भर गया, साथ ही अपने भाषण के प्रभाव को दोनो अनपढ़ ठाकुरों के चेहरे पर भी पढ़ने लगा । और सोचने लगा की इतना प्रभावी और ज्ञान से ओत-प्रोत भाषण सुनकर दोनो पाँच क्या दस जूते मारेंगे ।
किंतु
कर्म की गति जो विचित्र ठहरी । कब किस ओर चल देगी, यदि कोई कह सकता तो आज यह मानव
की दशा ही भला क्यूँ हुई होती । राम ने जैसे उल्टा समझा वैसे ही दोनों ठाकुर पलक
झपकते ही सिपाही को उस मूर्ति के चरणों में दंडवत लेटे दिखाई दिए और दोनो एक ही
सुर में भूमिष्ठ हो गद्गद स्वर में स्तुति-पाठ करने लगे कि," अब अंदर जाने का क्या काम और दूसरे
देवता को भला क्या और क्यूँ ही देखें .... शाबाश रे येजीद , वास्तव में देवता तो तू ही एक है अरे
मोरे देवता, तू सारे का अस मारेउ कि ई सब सार अबहिन तक रोवत हैं" (साले को
ऐसा मारा कि ये सब साले अभी तक रोते हैं) !!!!!
सनातन
हिंदू धर्म का गगनचुंबी मंदिर है- उस मंदिर के अंदर जाने के मार्ग भी कितने ही हैं
और वहाँ है क्या नहीं ?... वेदांती के निरगुन ब्रह्म से लेकर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, शक्ति, सूर्य, चूहे पर सवार गणेश और भी तमाम छोटे
मोटे देवता ! फिर वेद, वेदांत, दर्शन, पुराण एवं तंत्र में बहुत सी सामग्री है, जिसकी एक एक बात से भवबंध टूट जाता है
। और लोगों की भीड़ का तो कहना ही क्या करोड़ों करोड़ लोग उस ओर दौड़े चले जा रहे
हैं । मुझे भी उत्सुकता हुई मैं भी दौड़कर पहुँचा! किंतु यह क्या ? मैं तो जाकर देखता हूँ एक अद्भुत कांड
!!!
कोई भी मंदिर के अंदर नहीं जा रहा है । दरवाजे के पास एक पचास सिर वाली, सौ हाथ वाली, दो सौ पेट वाली और पाँच सौ पैर वाली एक मूर्ति खड़ी है !! उसी के पैरों में सब लोट-पोट हो रहे हैं । एक व्यक्ति से कारण पूछने पर उत्तर मिला," भीतर जो सब देवता हैं, उनको दूर से प्रणाम करने से ही या दो एक फूल डाल देने से ही उनकी यथेष्ट पूजा हो जाती है । मगर असली पूजा तो इनकी होनी चाहिए, जो दरवाजे पर विद्यमान हैं, और जो वेद, वेदांत, दर्शन, पुराण और शास्त्र सब देख रहें हों, उन्हें कभी-कभी सुन लो तो भी कोई हानि नहीं, किंतु इनका आदेश तो प्राणों की आहुति देकर भी मानना ही पड़ेगा । तब मैने पूछा कि, “भला ये कौन देवता हैं? जो मंदिर के बाहर रहकर भी इतने प्रभावी हैं” , उत्तर मिला “इनका नाम “लोकाचार” है रे भाई !!! लोग जन्म से मरण तक बिना इनके बारे में सोचे-पूछे (कि लोग क्या कहेंगे? )मज़ाल है जो एक तृण भी हिला दें l मुझे तुरंत लखनऊ के ठाकुर साहब की बात याद आ गयी, "शाबाश ! रे "लोकाचार", सारे का अस मारेउ की ई सब सार अबहिन तक रोवत हैं !!!" (साले को ऐसा मारा कि ये सब साले अभी तक रोते हैं) !!!!!