एक समर्थ लेखक और एक सचेत
शिकारी के बीच बहुत बारीक से अंतर के साथ, एक गहरी समानता होती है l लेखक के सामने भी मानव मन
का, अंतर्रात्मा का घना जंगल होता है l सत्य के सूरज और आत्मा की ज़मीन को मिलने
से रोकते हुए दैत्यकाय वट-वृक्षों से लेकर, कायरता का अँधेरा समेटे घने झुरमुटों
का जंगल l बिल्कुल एक शिकारी की तरह दुनिया के बाकी गोरखधंधों से जानबूझकर बेख़बर
लेखक के लिए जानने योग्य केवल एक ही रहस्य है, वो है जंगल l चेतन-अवचेतन की
शिकारगाह l शिकारी की तरह कटिबद्ध होकर, अपने हथियार जाँचकर लेखक उतारता है इस
जंगल में l तर्क, विचार और अनुभव के शष्त्र लेकर l शिकारी अपनी जान का दाँव लगाता है और लेखक अपने अस्तित्व का l दोनों के सामने पूरा जंगल अपना चुनौती भरा विस्मय
लेकर खड़ा होता है l एक ऐसी दुनिया जो खुद के चलने पर चरमराते सूखे पत्तों से लेकर,
डाल छोड़कर उड़े पंछी के पंखों की फड़फड़ाहट से हर क्षण चकित करती है l यही अवसर
होता है जब शरीर का अंग-प्रत्यंग सजग,स्फूर्ति से भरा और ईमानदार
हो जाता है l अनगिनत आँखों में तैरते असंख्य भावों से जंगल का हर जानवर आपकी हर
चाल पर नजर रखे हुए होता है l सामान्य नियम तथा गति से चलते इस संसार में एक अजनबी
को देखकर सभी प्राणी सुरक्षित जगह तलाशकर सिमट जाते हैं l जैसे लेखक को देखकर उसका
अंतर उसे छलने लगता है l शिकारी और जंगल देर तक एक दूसरे की घात में, एक दूसरे को
तौलते रहते हैं l जितने प्राणी उतनी साँसें, उतनी गंध l हर आहट, हर थिरकन पिछली
वाली से पूरी तरह अलग l शिकारी लगभग हर गंध पहचानता है, ख़तरे की भी और अवसर की भी
l लेखक की तरह ही शिकारी को जंगल के सन्नाटे की हर किस्म का पता होता है l उसे मौन
के संवाद की कला पता है l यही “मिस्टिकल-सेन्स” शिकारी को शिकारी और लेखक को लेखक
बनाती है l
फिर जैसे-जैसे शिकारी अंदर बढ़ता जाता
है, उसकी दोनों आँखों के बीच बल पड़ता जाता है l उसे जंगल बारीक़ से सुराग देता
रहता है, जिस पर उसकी जिंदगी उस क्षण टिकी होती है l फिर अचानक वो उन अनगिनत गंधों
में से किसी एक गंध को पहचान लेता है l किसी एक थिरकन को भाँप जाता है l
बस्स्स... फिर उसके लिए बाकी जंगल का
कोई मोल नहीं l
हर विचार, हर भाव से निस्संग होकर सम्पूर्ण एकाग्र हो जाता है वो
उसी एक पर l
उसकी सभी इन्द्रियां उस एक के साथ एकाकार होकर उसका अनुमान कर लेती
हैं l फिर धीरे धीरे प्रत्येक छोटे
से छोटे प्रलोभनों को छोड़ते
रहने के मूल्य में उन दोनों की निस्संगता पकती चली जाती है l शिकारी और
लेखक दोनों
उसी एक को जीने लगते हैं l क्षण प्रतिक्षण वो परकाया प्रवेश करते जाते हैं और अंत
में उस एक
गंध,एक थिरकन, एक आहट का साक्षात्कर कर पाते हैं,
उसी के अपने शरीर में रहते हुए l उसकी अगली हर
चाल और संभावित दिशा का पूर्वानुमान
होने लगता है l
कौन किसको भगा रहा है? नहीं मालूम पड़ता, कौन किसके
शिकार पर है? कह नहीं सकते l
शिकार और शिकारी दोनों एक दूसरे का पूर्वानुमान लगाकर
अगली चाल चलते हैं l फिर एक क्षण आता है जब शिकारी को उसका शिकार हाथ लग जाता है, कोई चाल
कामयाब हो जाती है l उसके हाथ रक्त से सनी शिकार की देह छू सकते हैं l
यहीं लेखक का परिणाम कुछ
और हो जाता है l उसका भाव, विचार या चरित्र पूरी तरह पुष्ट हो जाता है, और बदले
में लेखक का पूर्वानुमान घायल हो जाता है, कभी कभी उसकी मृत्यु भी हो जाती है l
लेखक को लगता है कि, अरे! यह तो वही है, जिसकी तलाश में, मैं इतनी दूर अंतर्मन की
भूलभुलैया पार करके यहाँ तक पहुँचा हूँ l
और फिर तभी उसे पता चलता
है कि मुझे इसकी तलाश नहीं थी, इसे मेरी तलाश थी l शिकार और शिकारी यहाँ एक हो जाते हैं l अपनी
सम्पूर्णता में एक l
और लेखक नोवालिस कि उस
उक्ति के साथ वापस लौटता है कि, “हम सत्य नहीं पा सकते, केवल अपने भ्रमों के
आईने से उसकी उपस्थिती का आभास पा सकते हैं l”
