मुसाफिर, रेलगाड़ी, टिकिटबाबू और पटरियाँ
जो गुज़रता है फ़ितरतन, वो वक्त अभी ज़िन्दा है ;
पतझड़ की जुबाँ सीखी, बारिशों की कीमत पर,
शाख़ें तो और भी आएँगी, वो दरख़्त अभी ज़िन्दा है !!
चिट्ठियाँ, कलम और नीले चाँद की पैमाइश लिए
तंग जेबों में दो मुट्ठी रौशनी की गुंजाइश लिए ;
दुआ देकर जिसे भरी आँखों से रुख्सत किया था माँ ने
टटोलना कभी, बेज़ार है पर वो कमबख्त अभी ज़िन्दा है
जो गुज़रता है फ़ितरतन, वो वक्त अभी ज़िन्दा है ...!!
जो गुज़रता है फ़ितरतन, वो वक्त अभी ज़िन्दा है ;
पतझड़ की जुबाँ सीखी, बारिशों की कीमत पर,
शाख़ें तो और भी आएँगी, वो दरख़्त अभी ज़िन्दा है !!
चिट्ठियाँ, कलम और नीले चाँद की पैमाइश लिए
तंग जेबों में दो मुट्ठी रौशनी की गुंजाइश लिए ;
दुआ देकर जिसे भरी आँखों से रुख्सत किया था माँ ने
टटोलना कभी, बेज़ार है पर वो कमबख्त अभी ज़िन्दा है
जो गुज़रता है फ़ितरतन, वो वक्त अभी ज़िन्दा है ...!!