हर बार समय का रूप ढ़ले,
उस बड़ी झील के पार कहीं
जाने कितने सूरज पिघले,
किंतु निशा के विरहगान का
यह क्षण अन्तिम, यह क्षण अन्तिम ;
वह पथिक बना या दैवदीप
है कौन? उसे बतलाए जो,
अंतरतम् के भय और तम में
अंतर उसको
दिखलाए जो,
लेकिन प्रश्नों से प्रश्नों का
यह रण अन्तिम, यह रण अन्तिम ;
चौंसठ योगिनियों
से बचकर
उसने मधु
का रसपान किया,
मरघट की भस्म का तिलक लगा
उसने जीवन
का गान किया,
स्वप्नों की इस पर्णकुटी का
यह तृण अन्तिम, यह तृण अन्तिम ;
वचनामृत है आधार प्रिये !
क्षण प्रतिक्षण रीत रहा है जो,
पुष्प की अभिलाषा सदृश
मानव का गीत रहा है जो,
स्वीकार प्रभो ! तुम जो भी दो
यह प्रण अन्तिम, यह प्रण अन्तिम ;!!
