Monday, 3 March 2014

आखेटक शब्दों का...



एक समर्थ लेखक और एक सचेत शिकारी के बीच बहुत बारीक से अंतर के साथ, एक गहरी समानता होती है l लेखक के सामने भी मानव मन का, अंतर्रात्मा का घना जंगल होता है l सत्‍य के सूरज और आत्मा की ज़मीन को मिलने से रोकते हुए दैत्यकाय वट-वृक्षों से लेकर, कायरता का अँधेरा समेटे घने झुरमुटों का जंगल l बिल्कुल एक शिकारी की तरह दुनिया के बाकी गोरखधंधों से जानबूझकर बेख़बर लेखक के लिए जानने योग्य केवल एक ही रहस्य है, वो है जंगल l चेतन-अवचेतन की शिकारगाह l शिकारी की तरह कटिबद्ध होकर, अपने हथियार जाँचकर लेखक उतारता है इस जंगल में l तर्क, विचार और अनुभव के शष्त्र लेकर l शिकारी अपनी जान का दाँव लगाता है और लेखक अपने अस्तित्व का l दोनों के सामने पूरा जंगल अपना चुनौती भरा विस्मय लेकर खड़ा होता है l एक ऐसी दुनिया जो खुद के चलने पर चरमराते सूखे पत्तों से लेकर, डाल छोड़कर उड़े पंछी के पंखों की फड़फड़ाहट से हर क्षण चकित करती है l यही अवसर होता है जब शरीर का अंग-प्रत्यंग सजग,स्फूर्ति से भरा और ईमानदार हो जाता है l अनगिनत आँखों में तैरते असंख्य भावों से जंगल का हर जानवर आपकी हर चाल पर नजर रखे हुए होता है l सामान्य नियम तथा गति से चलते इस संसार में एक अजनबी को देखकर सभी प्राणी सुरक्षित जगह तलाशकर सिमट जाते हैं l जैसे लेखक को देखकर उसका अंतर उसे छलने लगता है l शिकारी और जंगल देर तक एक दूसरे की घात में, एक दूसरे को तौलते रहते हैं l जितने प्राणी उतनी साँसें, उतनी गंध l हर आहट, हर थिरकन पिछली वाली से पूरी तरह अलग l शिकारी लगभग हर गंध पहचानता है, ख़तरे की भी और अवसर की भी l लेखक की तरह ही शिकारी को जंगल के सन्नाटे की हर किस्म का पता होता है l उसे मौन के संवाद की कला पता है l यही “मिस्टिकल-सेन्स” शिकारी को शिकारी और लेखक को लेखक बनाती है l
फिर जैसे-जैसे शिकारी अंदर बढ़ता जाता है, उसकी दोनों आँखों के बीच बल पड़ता जाता है l उसे जंगल बारीक़ से सुराग देता रहता है, जिस पर उसकी जिंदगी उस क्षण टिकी होती है l फिर अचानक वो उन अनगिनत गंधों में से किसी एक गंध को पहचान लेता है l किसी एक थिरकन को भाँप जाता है l
बस्स्स... फिर उसके लिए बाकी जंगल का कोई मोल नहीं l
 हर विचार, हर भाव से निस्संग होकर सम्पूर्ण एकाग्र हो जाता है वो उसी एक पर l 
उसकी सभी इन्द्रियां उस एक के साथ एकाकार होकर उसका अनुमान कर लेती हैं l फिर धीरे धीरे प्रत्येक छोटे 
से छोटे प्रलोभनों को छोड़ते रहने के मूल्य में उन दोनों की निस्संगता पकती चली जाती है l शिकारी और 
लेखक दोनों उसी एक को जीने लगते हैं l क्षण प्रतिक्षण वो परकाया प्रवेश करते जाते हैं और अंत में उस एक 
गंध,एक थिरकन, एक आहट का साक्षात्कर कर पाते हैं, उसी के अपने शरीर में रहते हुए l उसकी अगली हर 
चाल और संभावित दिशा का पूर्वानुमान होने लगता है l
कौन किसको भगा रहा है? नहीं मालूम पड़ता, कौन किसके शिकार पर है? कह नहीं सकते l 

शिकार और शिकारी दोनों एक दूसरे का पूर्वानुमान लगाकर अगली चाल चलते हैं l फिर एक क्षण आता है जब शिकारी को उसका शिकार हाथ लग जाता है, कोई चाल कामयाब हो जाती है l उसके हाथ रक्त से सनी शिकार की देह छू सकते हैं l

यहीं लेखक का परिणाम कुछ और हो जाता है l उसका भाव, विचार या चरित्र पूरी तरह पुष्ट हो जाता है, और बदले में लेखक का पूर्वानुमान घायल हो जाता है, कभी कभी उसकी मृत्यु भी हो जाती है l लेखक को लगता है कि, अरे! यह तो वही है, जिसकी तलाश में, मैं इतनी दूर अंतर्मन की भूलभुलैया पार करके यहाँ तक पहुँचा हूँ l 
और फिर तभी उसे पता चलता है कि मुझे इसकी तलाश नहीं थी, इसे मेरी तलाश थी l शिकार और शिकारी यहाँ एक हो जाते हैं l अपनी सम्पूर्णता में एक l
और लेखक नोवालिस कि उस उक्ति के साथ वापस लौटता है कि, “हम सत्‍य नहीं पा सकते, केवल अपने भ्रमों के आईने से उसकी उपस्थिती का आभास पा सकते हैं l”