Friday, 27 September 2013

शिव-शव-शिवोहम्





जिनके दर्शन मात्र से दाल चावल में कंकड़ मिलाने वाले, विधवा-ग़रीब की ज़मीन हड़पने वाले, काग़ज़ पर सरकारी रुपयों से पुल बनाने वाले और तमाम समूल-सुख-नाशक सुकर्म करने वाले व्यापारी, अधिकारी और नेतागण संसार रूपी भवसागर से चंदन की लकड़ी पर देसी घी पी कर पार पाते हैं; उन्हीं देवता के दर्शन हेतु एक हालिया मुअत्तल अधिकारी सवा पाव लड्डू लेकर उपस्थित हुआ।

ठाकुर जी के दर्शन पाकर उनका हृदय यथेष्ठ श्रद्धा एवं भक्ति से झमाझम भर गया और किसी का उधार कभी ना रखने की आदत के कारण उन्होनें ठाकुर जी को खुश करने के लिए बचपन में स्कूल में सुना एक राग अलापना प्रारंभ कर दिया।

दालान के एक कोने में साढ़े तीन पाए की एक कुर्सी पर चउचक बैठे हुए चौबेजी ध्यान की राजमुद्रा में सो रहे थे। चौबेजी गाँव के माने हुए पहलवान थे। कइयों के शरीर की आज तक टूटी हड्डियाँ इस बात की गवाही देती हैं। जब पहलवानी में कोई मज़ा नही रहा तो पहले पुराने कुकर्मों की मुआफी के लिए, बाद में सरल सहज व्यापार घर बैठे करने के लिए इस इकलौते मंदिर के पुजारी हो गये, जिसकी स्थापना का आदेश उन्हें सपने में साक्षात शिव जी ने दिया था।

चौबेजी जब-तब आज भी आदतन दाँव खेल जाया करते हैं; मगर हर वक़्त उधार खाया आसामी कहाँ मिले, जो अपनी मर्ज़ी से बिना हाथ पाँव चलाए चौबे जी की खुशी के लिए धूल में लोटकर इनके धोबी पछाड़ सहे और फिर हफ्तों घरवाली से तेल-मालिश के वक्त गाली सुने। सो हमारे चौबेजी उस वक़्त खुद के मन की शांति के लिए सितार पर दाँव चलाया करते थे और चंदे से ख़रीदे हारमोनियम की रगड़मपट्टी कर दिया करते थे और गाँव के खलिहर नौजवान तथा बच्चे स्कूल छोड़कर परसाद के आधे-तिहाई लड्डू के चक्कर में, कान बंद करके इनके सुधि श्रोता गण हुआ करते हैं। चौबे जी में सुबेह शाम एक-एक लोटा भंग चढ़ाने से लेकर गाँजा रगड़ने तक और भी कई सद्गुण हैं।

भाई अब चौबे जी ठहरे संगीत के पारखी, जिनमें पारखी होने के सारे ही गुण विद्यमान हैं। तो जैसे ही इस नये भक्त का कर्णभेदी “बिकट-राग” चौबे जी के कानों तक पहुँचा, चौबे जी की पहले तीसरी बाद में बाकी की दोनों आँखें भी खुल गयीं। जिन चौबे जी की आँख भंग चढ़ने के बाद बगल से भारतीय विवाह की बारात के गुज़र जाने पर भी नहीं खुलती उन चौबे जी की आँखें खोलने वाले राग की विकटता का अनुमान पाठकगण सहज ही लगा सकते हैं।

तरुण-अरुण-किरण वर्ण नशीले नेत्रों को इधर उधर घुमाकर अपने मन की चंचलता का कारण ढूँढने में व्यस्त चौबे जी को धुंधला सा दीख पड़ा कि एक तोंद पर हाथ टिकाए कोई सेठ है, जो अपने ही भाव में मस्त होकर विवाह बीत जाने पर जूठे बर्तनों के माँजे जाने की भाँति कर्णकटु स्वर में टूटी-फूटी चौपाईयाँ ऐसे गाए जा रहा है, जैसे पिण्डदान कर रहा हो। अपने नशे की स्वर्ण लंका में इस बंदर के प्रत्यक्ष आग लगा देने से मर्माहत चौबे जी शिवतांडवी नाद में उसके उपर बरस पड़े," क्यूँ बे ? धरती पर प्रलय आई हो ऐसा तो लगता नहीं, आसमान से सोना बरस नहीं रहा और ना तो आँटा तेल के दाम ही कम हुए, तो फिर कौन मर गया जो इस बेसुर बेताल में गला फाड़कर एक ईश्वर चिंतन में डूबे ब्राह्मण को उसकी भाव-निद्रा से जगा दिया”। .....

उधर से सेठ ने उत्तर दिया, “पंडिज्जी नाराज़ क्यूंकर होते हो, अरे कल जिस घोड़े पर दाँव लगाया है वही जीते इसी की अरज तो लगा रहा था ठाकुर से, अब इसमें सुर ताल का भला क्या काम? इस बीच चौबे जी की शिकारी नज़र सेठ के हाथों में रतन हलवाई के देसी घी से बने सवा पाव लड्डूओं को ताड़ गयी, सो आवाज़ मौके मुहालत के हिसाब से थोड़ी नरम करते हुए बोले, “शिव शिव कहिए सेठ जी, भगवान क्या किसी एक के हैं जितने मेरे उतने आपके भी तो हैं”।

सेठ ने शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के कथा चरित्रों सी अबूझ भावुकता में कहा," अरे क्या खाक हमारे हैं, अगर हमारे होते तो क्या हमारी सुनते भी नहीं। पिछली बार घर से लगे गाँव के मंदिर का अहाता थोड़ा सा अपने आँगन में क्या मिला लिया तो उस स्साले मास्टर ने मुक़दमा कर दिया और मैं हार भी गया। अब आप ही बताओ पंडिज्जी, क्यूँ हरवाया मुक़दमा ठाकुर जी ने ? मैं पूछता हूँ की क्या “सबहिं भूमि गोपाल की नहीं है”??? ज़मीन मुझे मिल जाती तो दो दो पेड़ आम और जामुन के लगा देता। तो सिर्फ़ मैं और मेरे बच्चे ही खाते क्या? इनको भी तो रोज भेजा करता? लेकिन नहीं, हरवा दिया। सवा पाव लड्डू की भी तो लाज नहीं रखी।
सेठ की इस दारुणकथा से मुँह बनाकर द्रवित होने में अभिनेताओं को भी अँगूठा दिखाते हुए चौबेजी ने ऐसी “च्च-च्च-च्च” की ध्वनि निकाली जैसे सदासुहागिन चौड़े लाल सिंदूर वाली नई नवेली बहुएँ मुहल्ले की किसी लड़की के घर से भाग जाने पर करतीं हैंl
 पता नहीं क्यूँ पर इस बार फिर से लखनऊ के ठाकुर साहब की बात याद आ गयी,    "शाबाश रे ! "लोकाचार", सारे का अस मारेउ की ई सब सार अबहिन तक रोवत हैं !!!" (साले को ऐसा मारा कि ये सब साले अभी तक रोते हैं!!!!





Saturday, 21 September 2013

लोकाचार




लोकाचार


लखनऊ शहर में मुहर्रम की बड़ी धूम है l बड़ी मस्ज़िद - इमामबाड़े में सजावट और रौशनी की बहार का तो कहना ही क्या l बेशुमार लोग आ-जा रहे हैं l हिंदू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी आदि अनेक जाति के स्त्री-पुरुषों की भीड़ की भीड़ आज मुहर्रम देखने को एकत्रित हुई है। लखनऊ शिया लोगों की राजधानी है । आज हज़रत इमाम हुसैन के नाम का आर्तनाद आकाश को भी गुंजायमान कर रहा है । यह हृदय दहलाने वाला मर्सिया,  उसके साथ फूट-फूटकर रोना किसके हृदय को द्रवित ना कर देगा भला । सहस्र वर्ष की प्राचीन करबला की कथा आज फिर जागृत हो उठी थी ।

इन्ही दर्शकों की भीड़ में मनबहलाव तथा सजीव तमाशा देखने दूर के गाँव-गिराम से दो भद्र राजपूत भी चले आए थे । जैसा की प्रायः देहाती ज़मींदार लोग हुआ करते थे - ये दोनो भी निरक्षरभट्ट थे, अर्थात अँगूठाछाप थे l लखनऊ की इस्लामी सभ्यता, शीन-काफ का शुद्ध उच्चारण, शाइस्ता ज़ुबान, ढीली शेरवानी, चुस्त पायजामा और पगड़ी, रंग-बिरंगे कपड़ों का लिबास- ये सब आज भी दूर गाँव में प्रवेश कर वहाँ के ठाकुर लोगों को स्पर्श तक नहीं कर पाए थे। अतः ये ठाकुर लोग सरल और सीधे हैं और हमेशा जँवामर्द, चुस्त, मुस्तैद और मजबूत दिल वालों को ही पसंद करते हैं ।

दोनों ठाकुर साहब फाटक पार करके मस्जिद के अंदर प्रवेश करने ही वाले थे कि, कड़क मूँछों पर ताव देते हुए,लाल साफ़ा बाँधे सिपाही जी ने दोनों को अंदर जाने से मना कर दिया । जब ठाकुरों ने इसका कारण पूछा तो सिपाही जी ने उत्तर दिया," यह जो दरवाज़े के पास मूर्ति खड़ी देख रहे हो ना, उसे पहले तुम दोनों पाँच-पाँच जूते मारो, तभी अंदर जा सकोगे"!!!!!

 दोनों ठाकुर किंकर्तव्यविमूढ़ होकर एक दूसरे का सूखा हुआ मुँह ताकने लगे।
मगर उनमें से तेज़तर्रार ठाकुर ने बरसों से यूँही पड़े हुए दिमाग़ को धक्का देकर चलाया और सिपाही जी को तनिक आँखें फैलाकर पूछा, “का हो सिपाही जी, ई लाल साफ़ा बाँध ल्यौ और जरा पीतल के चमाचम कमरबन्द पे बूट कस ल्यौ तो हमन ठाकुरन के एकदमई नकारा समझ ल्यौ का भाई। तुम्हरे जइसन इपाही-सिपाही सरवन हमार हुक्का भरत हैं। सम्झ्यौ की नाय ? ई मूर्ति है केकी और हम एका मारें काहे भाई । कसूर का है जी एका ?

सिपाही समझ गया कि ठाकूरसुहाती करनी ही पड़ेगी, सो ज़रा नरम होकर बोला – “ठाकुर साहेब, आपको तो हम देखते ही पहचान गये, अलबत्ता हम भी फौज से रेटार भए हैं और भवानी किरपा से देस खातिर एक लड़ाय भी लड़े मगर ठाकुर साहेब हम कौनो एम-टेम बात थोड़े ना बतियायन आप दूनौउन से ? अरे यही ई मेला के नियम है । अब आपई बताओ का हम काभौ नियम क़ानून से मुह फेर सकत हैं भला, तिस पर फ़ौजी ठहरे । भई ई मूर्ति जौन है ना, ई ससुरे महापापी येजीद की मूर्ति है । यही तो एक हज़ार साल पहिले मुहम्मद साहेब का कतल किए रहा और यही लिए तो ई सब आज का रोना धोना है बाबू साहेब” ।

सिपाही मन ही मन स्वयं के नवीं तक पढ़े होने के घमंड से भर गया, साथ ही अपने भाषण के प्रभाव को दोनो अनपढ़ ठाकुरों के चेहरे पर भी पढ़ने लगा । और सोचने लगा की इतना प्रभावी और ज्ञान से ओत-प्रोत भाषण सुनकर दोनो पाँच क्या दस जूते मारेंगे ।
किंतु कर्म की गति जो विचित्र ठहरी । कब किस ओर चल देगी, यदि कोई कह सकता तो आज यह मानव की दशा ही भला क्यूँ हुई होती । राम ने जैसे उल्टा समझा वैसे ही दोनों ठाकुर पलक झपकते ही सिपाही को उस मूर्ति के चरणों में दंडवत लेटे दिखाई दिए और दोनो एक ही सुर में भूमिष्ठ हो गद्गद स्वर में स्तुति-पाठ करने लगे कि," अब अंदर जाने का क्या काम और दूसरे देवता को भला क्या और क्यूँ ही देखें .... शाबाश रे येजीद , वास्तव में देवता तो तू ही एक है अरे मोरे देवता, तू सारे का अस मारेउ कि ई सब सार अबहिन तक रोवत हैं" (साले को ऐसा मारा कि ये सब साले अभी तक रोते हैं) !!!!!

सनातन हिंदू धर्म का गगनचुंबी मंदिर है- उस मंदिर के अंदर जाने के मार्ग भी कितने ही हैं और वहाँ है क्या नहीं ?... वेदांती के निरगुन ब्रह्म से लेकर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, शक्ति, सूर्य, चूहे पर सवार गणेश और भी तमाम छोटे मोटे देवता ! फिर वेद, वेदांत, दर्शन, पुराण एवं तंत्र में बहुत सी सामग्री है, जिसकी एक एक बात से भवबंध टूट जाता है । और लोगों की भीड़ का तो कहना ही क्या करोड़ों करोड़ लोग उस ओर दौड़े चले जा रहे हैं । मुझे भी उत्सुकता हुई मैं भी दौड़कर पहुँचा! किंतु यह क्या ? मैं तो जाकर देखता हूँ एक अद्भुत कांड !!!

कोई भी मंदिर के अंदर नहीं जा रहा है । दरवाजे के पास एक पचास सिर वाली, सौ हाथ वाली, दो सौ पेट वाली और पाँच सौ पैर वाली एक मूर्ति खड़ी है !! उसी के पैरों में सब लोट-पोट हो रहे हैं । एक व्यक्ति से कारण पूछने पर उत्तर मिला," भीतर जो सब देवता हैं, उनको दूर से प्रणाम करने से ही या दो एक फूल डाल देने से ही उनकी यथेष्ट पूजा हो जाती है । मगर असली पूजा तो इनकी होनी चाहिए, जो दरवाजे पर विद्यमान हैं,  और जो वेद, वेदांत, दर्शन, पुराण और शास्त्र सब देख रहें हों, उन्हें कभी-कभी सुन लो तो भी कोई हानि नहीं, किंतु इनका आदेश तो प्राणों की आहुति देकर भी मानना ही पड़ेगा । तब मैने पूछा कि, “भला ये कौन देवता हैं? जो मंदिर के बाहर रहकर भी इतने प्रभावी हैं” , उत्तर मिला “इनका नाम “लोकाचार” है रे भाई !!! लोग जन्म से मरण तक बिना इनके बारे में सोचे-पूछे (कि लोग क्या कहेंगे? )मज़ाल है जो एक तृण भी हिला दें l मुझे तुरंत लखनऊ के ठाकुर साहब की बात याद आ गयी,    "शाबाश ! रे "लोकाचार", सारे का अस मारेउ की ई सब सार अबहिन तक रोवत हैं !!!" (साले को ऐसा मारा कि ये सब साले अभी तक रोते हैं) !!!!!



Friday, 10 May 2013

यह प्रण अन्तिम, यह रण अन्तिम...


बूढ़े बरगद की छाँव लिए
हर बार समय का रूप ढ़ले,
उस बड़ी झील के पार कहीं
जाने कितने सूरज पिघले,
किंतु निशा के विरहगान का
यह क्षण अन्तिम, यह क्षण अन्तिम ;

                                  वह पथिक बना या दैवदीप
                                  है कौन? उसे  बतलाए  जो,
                                  अंतरतम् के भय और तम में
                                  अंतर  उसको  दिखलाए  जो,
                                   लेकिन प्रश्नों से प्रश्नों का
                                 यह रण अन्तिम, यह रण अन्तिम ;

चौंसठ  योगिनियों  से  बचकर
उसने  मधु  का  रसपान  किया,
मरघट की भस्म का तिलक लगा
उसने  जीवन  का  गान  किया,
स्वप्नों की इस पर्णकुटी का
यह तृण अन्तिम, यह तृण अन्तिम ;

                                   वचनामृत है  आधार  प्रिये !
                                   क्षण प्रतिक्षण रीत रहा है जो,
                                    पुष्प की अभिलाषा सदृश
                                    मानव का गीत रहा है जो,
                                  स्वीकार प्रभो ! तुम जो भी दो
                                यह प्रण अन्तिम, यह प्रण अन्तिम ;!!


Wednesday, 8 May 2013

वक्त अभी ज़िन्दा है ...!!

मुसाफिर,  रेलगाड़ी,  टिकिटबाबू  और  पटरियाँ

जो गुज़रता है फ़ितरतन, वो वक्त अभी ज़िन्दा है ;

पतझड़ की जुबाँ सीखी,  बारिशों की कीमत पर,

शाख़ें तो और भी आएँगी, वो दरख़्त अभी ज़िन्दा है !!


                                             चिट्ठियाँ, कलम और नीले चाँद की पैमाइश लिए

                                             तंग जेबों में  दो मुट्ठी रौशनी की  गुंजाइश लिए ;

                                         दुआ देकर  जिसे भरी आँखों से रुख्सत  किया था माँ ने

                                         टटोलना कभी, बेज़ार है पर वो कमबख्त अभी ज़िन्दा है 

                                        जो गुज़रता है फ़ितरतन, वो  वक्त अभी ज़िन्दा है ...!!

Sunday, 28 April 2013

" मा फलेषु कदाचनः "


लक्ष्य, प्रयास, परीक्षण और परिणाम 
शब्द  नहीं  ये  परिभाषा  हैं  ,
नित-नित गहराते तम में भी 
बुझते प्रकाश की एक आशा हैं ;

                                               दूर क्षितिज पर स्वप्न एक 
                                               जब थोडा धुंधला हो जाए, 
                                               जब रेखा भय की चुपके से 
                                               मन में कायरता भर जाए ;

जब लगे की सब निष्फल होगा 
और अस्त्र-शस्त्र भी शेष न हो,
अंत समय में मृत्यु निकट हो 
और शत्रु से भी क्लेश न हो ;

                                              तब रात्रि पूर्णिमा की हो यदि 
                                              और गंगा का तट निकट कहीं, 
                                              कोई अर्पण करता हो दीपक 
                                               हो  घंटों  का  अनुनाद  वहीँ ;

क्षण भर रुक कर करना चिंतन 
क्या इस जल में भी है जीवन ?
फिर भी तो पूजा जाता है !
श्रद्धा  जग की ये  पाता है ,

                                                क्यूंकि हे मेरे धरापुत्र !!

                                               उस जीवन का अर्थ ही क्या ?
                                              जहाँ जीवटता, विश्वास न हो ,
                                               मृत्यु  से  पहले  ही  जैसे 
                                              जीवित प्राणी में श्वास न हो ;

हैं जीवन समर में अर्जुन असंख्य !
हतबुद्धि  खड़े  ले  धनुष  हाथ ;
प्रत्यंचा  में  कम्पन  ही  नहीं 
अब  कृष्ण  नहीं हैं  उनके साथ ,

                                               सारा रण तूने जीत लिया !!
                                               अब मौन खडा क्या सोच रहा ?
                                               सब चढ़े बलि सिद्धांतों पर 
                                               स्वजनों के लिए क्या सोच रहा ?

हे पार्थ मेरे ये धर्मयुद्ध !!!!

तू शस्त्र उठा,   तू भेद लक्ष्य 
कृष्ण  तेरे अब ह्रदय में हैं ;
कौरव सेना अविजित तो क्या ?
कृष्ण  तेरे अब  ह्रदय में हैं ;

                                                गंगा की कल कल ध्यान से सुन !
                                                रण का क्रंदन भी ध्यान से सुन !
                                                क्या कहा कृष्ण ने ध्यान से सुन !
                                                है जो अंतर्मन में ध्यान से सुन !

सब  एक  बात,  सब  एक  तथ्य 
आधार  एक  और  ए क तत्व ;
जो  गूँज  रहा  आदि  से  अंत !!!
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचनः "

                                                                                    सुमित सिंह दीक्षित 

सर्जक और सर्जना


आज रचेगा बूँद एक वो !
उसका सागर भी प्यासा है,
कल्पित को देगा शब्द आज
जो अब तक धुँआ धुँआ सा है ;

कल्पना आज होगी सजीव जो
जीवन के तल पर ठहरे,
समवेत सत्य का ज्ञान जहाँ
भाषा, रस, छंद से हो जो परे;

साक्षी हो जो मौन नाद की
बूँद  रचेगा  आज  वही,
अगणित असत्य कह, पाया जो
सत्य  कहेगा  आज  वही ;

बूँद साध्य हैबूँद है साधन
बूँद स्वयं प्रतियोगी है,
सिंहासन  का भोग बूँद है
बूँद पथिक, पथ, जोगी है ;

इसी बूँद हेतु सब छूटा
इसी बूँद हेतु वो टूटा ;
इसी बूँद पर लक्ष्यित था वो
इसी बूँद में संचित था वो !

संकल्प बूँद है, प्राण बूँद
सत्य बूँद है, साक्ष्य बूँद,
सर्जक के नयनों से टपकी
बस यही बूँद है, वही बूँद !!!!!!

Thursday, 25 April 2013

सोशल मीडियाः रंग अनछुए हैं अभी कुछ


सोशल मीडियाः रंग अनछुए हैं अभी कुछ

-    सुमित सिंह दीक्षित

मै अकेला रहता हूँ, इसे आप मेरी बहादुरी समझ सकते हैं। लेकिन जिस तरह ज़मीन पर सोने वाले को पलंग से गिरने का डर नहीं होता उसी तरह मै जब तक अकेला हूँ, मुझे किसी का डर नहीं- जर्मन साहित्यकार फ्रांज काफ्का की डायरी से। 
सोशल नेटवर्किंग पर इतना कुछ लिखा और बोला गया है कि ऊपरी तौर से सोचने पर ऐसा जान पड़ता है कि जैसे अब किसी भी कोण से सोचने को कुछ भी बाकी ही नहीं रह गया है। लगता है जैसे तस्वीर के हर रंग और पक्ष की पूर्ण विवेचना हो चुकी है। मजेदार बात यह है कि अभी भी पुराने किस्सों का ही पुनरुत्पादन किया जा रहा है। चाहे वह मिस्र और ट्यूनीशिया हों या युवा और अन्ना हजारे। हर जगह सोशल नेटवर्किंग को एक अद्भुत हथियार के रूप में वर्णित किया जा रहा है, यह अलग बात है कि कुछ इसे सकारात्मक कहते हैं तो कुछ नकारात्मक।
लेकिन इस तथ्य पर सार्थक बहसें बहुत कम देखी गयी हैं कि महज कुछ वर्ष पहले अवतरित फेसबुक जैसी साइट्स किस कारण से चीन और भारत के बाद सबसे अधिक जनसंख्या वाली "आभासी राष्ट्र" बन गई। पचपन करोड़ से भी ज्यादा उपयोगकर्ताओं के साथ यह एक ऐसी शक्ति बन कर उभरी है जिसकी क्षमता पर कोई प्रश्न ही नहीं उठता, लेकिन कारण क्या है?
आज यदि सोशल नेटवर्किंग साइटों पर उमड़े इस जनसमुदाय को एक आभासी समाज मान लिया जाए तो इसकी उत्पत्ति और विकास के मूल तक जाने में सुविधा होगी। ऑस्ट्रियन चित्रकार कोकोश्का  ने एक बार कहा था- अकेलेपन के कारण ही मनुष्य ने समाज की अवधारणा की होगी, लेकिन इस सत्य ने कि, हर समाज एक यूटोपिया है, उसे दोबारा से अपने अकेलेपन में शरण पाने लिए बाध्य किया होगा
वृहदारण्यक उपनिषद का जीववाद, गौतम बुद्ध का सम्यकवाद, शंकर का मायावाद, रामानुज और वल्लभ का ब्रह्मसूत्र भाष्य इन सभी से लेकर कार्ल मार्क्स का द्वंदात्मक भौतिकवाद, काडवेल और राल्फ का वर्गसंघर्ष और गांधी की अहिंसा ये सभी मनुष्य के एकाकीपन को ही कहीं न कहीं परिभाषित तो करती हैं परन्तु उसका हल नहीं सुझातीं। अर्थात अकेलेपन से प्रारम्भ हुई यात्रा फिर उसे अकेलेपन तक ले आती है। चाहे कोई कुछ भी तर्क दे परन्तु यह सत्य है कि सोशल नेट्वर्किंग साइट्स पूर्णरूपेण मनुष्य के एकाकीपन से ही जीवित हैं और दिन-प्रतिदिन इनका फैलाव ही हो रहा है। यदि फेसबुक का बारीकी से निरीक्षण करें तो हमें एक ऐसा तत्व मिलेगा जो सभी वर्ग के उपयोगकर्ताओं में नियमित है और वह है उसकी आक्रामकता यह किसी भी तत्व को लेकर हो सकती है, चाहे वह कोई वाद हो या धर्म हो या पंथ हो या विचारधारा हो- सभी अप्रत्याशित रूप से आक्रामक हैं; और प्रख्यात मनोवैज्ञानिक फ्रायड ने कुंठा-आक्रमण (frustration-aggression) सिद्धान्त का विकास किया। उसने यह बताया कि आक्रामकता की उपस्थिति, कुंठा की उपस्थिति का स्पष्ट संकेत करती है।
मिलरने भी यही विचार दिया है की व्यक्ति में आक्रामक व्यवहार कितनी मात्रा में होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसका कुंठा-प्रयुत्तर (frustration-reaction) कितना शक्तिशाली है और इसी दिशा में फ्रायड के शिष्य रहे ऍडलर तथा जुंग इस बात की पुष्टि करते हैं कि व्यक्ति का तनाव कम या समाप्त तभी होता है जब वह अपनी आक्रामकता को व्यक्त कर लेता है। तो क्या हमारे तथाकथित क्रान्तिकारी युवा समाज की यह सारी आक्रामकता उसकी कुंठा का परिणाम है? उत्तर हमें गोर्कीके कथा चरित्रों और रिल्केके पत्रों में मिलता है। मक्सिम गोर्की के लगभग सभी कथा चरित्र नितांत और निजी अकेलेपन में जीवन यापन करते हैं, परन्तु वे आक्रामक नहीं हैं वे अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्ष जरूर करते हैं, परन्तु व्यर्थ की आक्रामकता से नहीं बल्कि शक्तिशाली और अधिकारप्राप्त वर्ग की सत्ता के साथ चलते हुए। हमारा अधिकांश फेसबुकिया वर्ग विरोध करता है लेकिन किसलिए? केवल अपनी शक्ति और सामर्थ्य साबित करने के लिए?
दूसरा सबसे बड़ा कारण है इस विशाल जनसंख्या की अभिव्यक्ति! सभी के पास अपनी अपनी अनुभूति है, आइसक्रीम खाने से लेकर भ्रष्टाचारियों के धन खाने तक, और हर कोई अपनी नितांत निजी अनुभूति को एक ऐसे चरम बिन्दु तक खींच ले जाना चाहता है, जहां वह, सार्वजनिक कर्मबने बिना भी, दुनिया की सतह पर एक प्रेत छाया की तरह प्रकट होती रहे। कुछ-कुछ उन दिवास्वप्नों की तरह जिन्हें लोग सडकों पर चलते हुए, बस की प्रतीक्षा करते हुए या सिर्फ अकेले में बैठे हुए देखते रहते हैं। यहाँ नीत्शे की द्वंदात्मक भौतिकवाद की परिकल्पना कितनी सटीक साबित होती है, कल्पना और सत्य के बीच द्वन्द्, स्वयं के अन्तरम्  में द्वन्द्। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर आक्रामकता के खोल में इस भय का व्यापार ही तो हो रहा है, और वह भी स्वेछा से! मास्लो का सामाजिक आवश्यकता का सिद्धांत उल्टा पड़ रहा है और “व्यक्ति रोटी से रुतबे की तरफ नहीं बल्कि रुतबे से रोटी की तरफ जा रहा है”।
इतने लोग हैं, कुछ तो होगाजैसे सर्वव्यापी मनोवैज्ञानिक भ्रम के कारण हम सब सोशल नेटवर्किंग के लिए टूट पड़े हैं। लियट की कविताओं पर विद्यार्थियों की पीढ़ियों ने शोध किया तो इनका कुछ तो अर्थ निकलता ही होगा। लेकिन कल्पना कीजिये कि यदि इनका कोई अर्थ न निकलता हो तो? यदि ये सारी कवितायें सिर्फ निर्जीव भ्रम कि वाहक हों तो? अँधेरे में खड़े पेड़ पर किसी आकृति के होने का भ्रम, लम्बी घास में सांप के सरकने का भ्रम और हम बार-बार वहां जाते हैं सिर्फ अपने इस भ्रम की पुष्टि के लिए, उस “कुछ को अनुभव करने।
वास्तव में हम दो दुनियाओं में जी रहे हैं; एक है दिन की दुनिया, जो वास्तविकता के प्रकाश से आलोकित है, और दूसरी है रात की दुनिया और इसी दुनिया में हम सभी जर्जरित और बौने लोग, जो दिन के उजाले में दुरदुराये जाते हैं, जो मुफ्त होते हैं; हम सब अचानक अपनी और दूसरों की आँखों में कायाकल्पित हो जाते है, समाज सेवियों, विचारकों, लेखकों में बदल जाते हैं। अपनी पूरी शक्ति के साथ पृथ्वी की समस्त शक्तियों के संपर्क में रहने वाले सर्वशक्तिमान मानव और हमारा इस तरह से अकेले कमरे में एक कम्प्यूटर के सामने परिवर्तित हो जाना कोई कला या सौंदर्यवादी कर्म नहीं है। यह एक तरह का जादू है जो हमारे और इस प्रतिकूल दुनिया के बीच मध्यस्थ की तरह क्रियाशील रहता है। हम इसके द्वारा एक ऐसी शांति पा लेते हैं जो हमारे आतंक और आकांक्षाओंपर कुछ समय के लिए ही सही परन्तु संतुष्टि का पर्दा तो डाल ही देती है ।जैसे धर्म मनुष्यों के लिए बना हैमनुष्य धर्म के लिए नहीं, ठीक वैसे ही फेसबुक जैसी साइट्स का फॉर्मेट सोचने के लिए बना है, उस फॉर्मेट के लिए हमारी सोच नहीं बनी। जैसे कि अध्ययन के पश्चात सामने आ रहा है, कि ये साइट्स अपने- अपने खांचे में उपयोगकर्ताओं की सोच को नियत कर रही हैं-
क्यूंकि अपने अकेलेपन से लड़ने का साहस मुट्ठीभर लोगों में ही होता है, क्यूंकि अकेलेपन में आत्मनिरीक्षण सबके बस का नहीं। लेकिन हर व्यक्ति जानता है कि यह उतना ही आवश्यक है जितना हृदय का धड़कना। तो क्यूँ  ऐसा करें की सांप भी मर जाये और लाठी भी  टूटे।
लीजिये शुरू हो गई सोशल नेटवर्किंग, लाइक, कमेंट और शेयर का खेल। आपको क्या लगता है कि करोड़ों की भीड़ में हर कोई एक-दूसरे का आंकलन, परीक्षण कर रहा है? जी नहीं! भीड़ में हर कोई अपना-अपना आंकलन कर रहा है। यह और बात है कि खुद को परखने की कसौटी उसने क्या तय की है?
हर सुबह एक लक्ष्य का उत्साह आपके भीतर हो ऐसा करने में हमारे संसार की सारी शक्तियां, हमारे विकास, हमारे विज्ञान, हमारी सभ्यता द्वारा निर्मित सारी क्षमताएं और औजार असमर्थ हैं- यह क्षमता केवल उस व्यक्ति में है जिसे आप शीशे के सामने आने पर देख पाते हैं, और आश्चर्यजनक रूप से उद्देश्यहीन भीड़ में आप अपनी इस क्षमता में स्पष्ट ह्वास अनुभव करेंगे। अलबत्ता आपको इस उत्साह तक पहुंचाने के रास्ते सोशल नेटवर्किंग की सड़क के आस पास से ही जाते हैं- ये वही रास्ते हैं जिन्हें जानने के लिए प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक और सामाजिक अवचेतना (social unconscious) के सिद्धांत का जन्मदाता कार्ल जुंग भारत आया, उसे अपना रास्ता मिला भारतीय दर्शन में, महर्षि रमण के द्वारा। सवाल उठता है कि क्या कोई बेहतर उपाय हमारे पास है? अपने अकेलेपन से लड़ने में जो सामाजिक, मानसिक, मूल्य हम चुका रहे हैं उसे बचाने का उपाय क्या है? श्रीमदभाग्वद्गीता के दूसरे अध्याय का 38वाँ श्लोक इसका उत्तर है-
सुखदुखे समेकृत्वा, लाभालाभौ जयाजयौ;
ततो युद्धाय युज्यस्वम्, नैवं पापमवाप्स्यसि !!
अर्थात सुख-दुःख में समान रहकर (बिना आक्रामकता के), लाभ-हानि तथा जय-पराजय की (वाद, पंथ, धारा से विरक्त) चिंता किये बिना जो भी इस युद्ध को लड़ेगावह लेशमात्र भी पाप का भागी नहीं बनेगा। इस उत्तर की मीमांसा आप पर छोड़ते हुए इतना अवश्य कहना चाहूँगा कि यवनिका उठती है और गिर जाती है। किन्तु यवनिका का प्रत्येक आक्षेप, परदे का प्रत्येक परिवर्तन, अपने अवसान में लीन होकर भी नाटक के प्रवाह में एक बूँद और डाल जाता है। वही बूँद, जो स्वयं कुछ नहीं है किन्तु जिसके बिना उस प्रवाह में गति नहीं आ सकती- जिसके बिना उसका अस्तित्व ही नहीं हो सकता।
-सुमित सिंह दीक्षित
संपादक युवा मन” (साहित्यिक पत्रिका)
270, रामबाग, इलाहबाद, उत्तर प्रदेश