जिनके दर्शन मात्र से दाल चावल में कंकड़ मिलाने वाले, विधवा-ग़रीब की
ज़मीन हड़पने वाले, काग़ज़ पर सरकारी
रुपयों से पुल बनाने वाले और तमाम समूल-सुख-नाशक सुकर्म करने वाले व्यापारी, अधिकारी
और नेतागण संसार रूपी भवसागर से चंदन की लकड़ी पर देसी घी पी कर पार पाते हैं;
उन्हीं देवता के दर्शन हेतु एक हालिया मुअत्तल अधिकारी सवा पाव लड्डू लेकर उपस्थित
हुआ।
ठाकुर जी के दर्शन पाकर उनका हृदय यथेष्ठ श्रद्धा एवं भक्ति
से झमाझम भर गया और किसी का उधार कभी ना रखने की आदत के कारण उन्होनें ठाकुर जी को
खुश करने के लिए बचपन में स्कूल में सुना एक राग अलापना प्रारंभ कर दिया।
दालान के एक कोने में साढ़े तीन पाए की एक कुर्सी पर चउचक
बैठे हुए चौबेजी ध्यान की राजमुद्रा में सो रहे थे। चौबेजी गाँव के माने हुए पहलवान
थे। कइयों के शरीर की आज तक टूटी हड्डियाँ इस बात की गवाही देती हैं। जब पहलवानी
में कोई मज़ा नही रहा तो पहले पुराने कुकर्मों की मुआफी के लिए, बाद में सरल सहज
व्यापार घर बैठे करने के लिए इस इकलौते मंदिर के पुजारी हो गये, जिसकी स्थापना का
आदेश उन्हें सपने में साक्षात शिव जी ने दिया था।
चौबेजी जब-तब आज भी
आदतन दाँव खेल जाया करते हैं; मगर हर वक़्त उधार खाया आसामी कहाँ मिले, जो अपनी
मर्ज़ी से बिना हाथ पाँव चलाए चौबे जी की खुशी के लिए धूल में लोटकर इनके धोबी पछाड़
सहे और फिर हफ्तों घरवाली से तेल-मालिश के वक्त गाली सुने। सो हमारे चौबेजी उस
वक़्त खुद के मन की शांति के लिए सितार पर दाँव चलाया करते थे और चंदे से ख़रीदे
हारमोनियम की रगड़मपट्टी कर दिया करते थे और गाँव के खलिहर नौजवान तथा बच्चे स्कूल
छोड़कर परसाद के आधे-तिहाई लड्डू के चक्कर में, कान बंद करके इनके सुधि श्रोता गण
हुआ करते हैं। चौबे जी में सुबेह शाम एक-एक लोटा भंग चढ़ाने से लेकर गाँजा रगड़ने
तक और भी कई सद्गुण हैं।
भाई अब चौबे जी
ठहरे संगीत के पारखी, जिनमें पारखी होने के सारे ही गुण विद्यमान हैं। तो जैसे ही
इस नये भक्त का कर्णभेदी “बिकट-राग” चौबे जी के कानों तक पहुँचा, चौबे जी की पहले
तीसरी बाद में बाकी की दोनों आँखें भी खुल गयीं। जिन चौबे जी की आँख भंग चढ़ने के
बाद बगल से भारतीय विवाह की बारात के गुज़र जाने पर भी नहीं खुलती उन चौबे जी की
आँखें खोलने वाले राग की विकटता का अनुमान पाठकगण सहज ही लगा सकते हैं।
तरुण-अरुण-किरण वर्ण नशीले नेत्रों को इधर उधर घुमाकर अपने
मन की चंचलता का कारण ढूँढने में व्यस्त चौबे जी को धुंधला सा दीख पड़ा कि एक तोंद
पर हाथ टिकाए कोई सेठ है, जो अपने ही भाव में मस्त होकर विवाह बीत जाने पर जूठे
बर्तनों के माँजे जाने की भाँति कर्णकटु स्वर में टूटी-फूटी चौपाईयाँ ऐसे गाए जा रहा
है, जैसे पिण्डदान कर रहा हो। अपने नशे की स्वर्ण लंका में इस बंदर के प्रत्यक्ष
आग लगा देने से मर्माहत चौबे जी शिवतांडवी नाद में उसके उपर बरस पड़े," क्यूँ बे ? धरती पर प्रलय आई
हो ऐसा तो लगता नहीं, आसमान से सोना बरस नहीं रहा और ना तो आँटा तेल
के दाम ही कम हुए, तो फिर कौन मर गया जो इस बेसुर बेताल में गला फाड़कर एक ईश्वर
चिंतन में डूबे ब्राह्मण को उसकी भाव-निद्रा से जगा दिया”। .....
उधर से सेठ ने उत्तर दिया, “पंडिज्जी नाराज़ क्यूंकर होते
हो, अरे कल जिस घोड़े पर दाँव लगाया है वही जीते इसी की अरज तो लगा रहा था ठाकुर
से, अब इसमें सुर ताल का भला क्या काम? इस बीच चौबे जी
की शिकारी नज़र सेठ के हाथों में रतन हलवाई के देसी घी से बने सवा पाव लड्डूओं को
ताड़ गयी, सो आवाज़ मौके मुहालत के हिसाब से थोड़ी नरम करते हुए बोले, “शिव शिव
कहिए सेठ जी, भगवान क्या किसी एक के हैं ?
जितने मेरे उतने आपके भी तो हैं”।
सेठ ने शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के कथा चरित्रों सी अबूझ
भावुकता में कहा," अरे क्या खाक
हमारे हैं, अगर हमारे होते तो क्या हमारी सुनते भी नहीं। पिछली बार घर से लगे गाँव
के मंदिर का अहाता थोड़ा सा अपने आँगन में क्या मिला लिया तो उस स्साले मास्टर ने
मुक़दमा कर दिया और मैं हार भी गया। अब आप ही बताओ पंडिज्जी, क्यूँ हरवाया मुक़दमा
ठाकुर जी ने ? मैं पूछता हूँ की क्या “सबहिं भूमि गोपाल की नहीं है”??? ज़मीन मुझे
मिल जाती तो दो दो पेड़ आम और जामुन के लगा देता। तो सिर्फ़ मैं और मेरे बच्चे ही
खाते क्या? इनको भी तो रोज
भेजा करता? लेकिन नहीं, हरवा
दिया। सवा पाव लड्डू की
भी तो लाज नहीं रखी।
सेठ की इस दारुणकथा से मुँह बनाकर द्रवित होने में
अभिनेताओं को भी अँगूठा दिखाते हुए चौबेजी ने ऐसी “च्च-च्च-च्च” की ध्वनि निकाली
जैसे सदासुहागिन चौड़े लाल सिंदूर वाली नई नवेली बहुएँ मुहल्ले की किसी लड़की के
घर से भाग जाने पर करतीं हैंl
पता नहीं क्यूँ
पर इस बार फिर से लखनऊ के ठाकुर साहब की बात याद आ गयी, "शाबाश रे ! "लोकाचार", सारे का अस मारेउ की ई सब सार अबहिन तक रोवत
हैं !!!" (साले को ऐसा मारा
कि ये सब साले अभी तक रोते हैं!!!!
