Sunday, 28 April 2013

सर्जक और सर्जना


आज रचेगा बूँद एक वो !
उसका सागर भी प्यासा है,
कल्पित को देगा शब्द आज
जो अब तक धुँआ धुँआ सा है ;

कल्पना आज होगी सजीव जो
जीवन के तल पर ठहरे,
समवेत सत्य का ज्ञान जहाँ
भाषा, रस, छंद से हो जो परे;

साक्षी हो जो मौन नाद की
बूँद  रचेगा  आज  वही,
अगणित असत्य कह, पाया जो
सत्य  कहेगा  आज  वही ;

बूँद साध्य हैबूँद है साधन
बूँद स्वयं प्रतियोगी है,
सिंहासन  का भोग बूँद है
बूँद पथिक, पथ, जोगी है ;

इसी बूँद हेतु सब छूटा
इसी बूँद हेतु वो टूटा ;
इसी बूँद पर लक्ष्यित था वो
इसी बूँद में संचित था वो !

संकल्प बूँद है, प्राण बूँद
सत्य बूँद है, साक्ष्य बूँद,
सर्जक के नयनों से टपकी
बस यही बूँद है, वही बूँद !!!!!!

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