मुसाफिर, रेलगाड़ी, टिकिटबाबू और पटरियाँ
जो गुज़रता है फ़ितरतन, वो वक्त अभी ज़िन्दा है ;
पतझड़ की जुबाँ सीखी, बारिशों की कीमत पर,
शाख़ें तो और भी आएँगी, वो दरख़्त अभी ज़िन्दा है !!
चिट्ठियाँ, कलम और नीले चाँद की पैमाइश लिए
तंग जेबों में दो मुट्ठी रौशनी की गुंजाइश लिए ;
दुआ देकर जिसे भरी आँखों से रुख्सत किया था माँ ने
टटोलना कभी, बेज़ार है पर वो कमबख्त अभी ज़िन्दा है
जो गुज़रता है फ़ितरतन, वो वक्त अभी ज़िन्दा है ...!!
जो गुज़रता है फ़ितरतन, वो वक्त अभी ज़िन्दा है ;
पतझड़ की जुबाँ सीखी, बारिशों की कीमत पर,
शाख़ें तो और भी आएँगी, वो दरख़्त अभी ज़िन्दा है !!
चिट्ठियाँ, कलम और नीले चाँद की पैमाइश लिए
तंग जेबों में दो मुट्ठी रौशनी की गुंजाइश लिए ;
दुआ देकर जिसे भरी आँखों से रुख्सत किया था माँ ने
टटोलना कभी, बेज़ार है पर वो कमबख्त अभी ज़िन्दा है
जो गुज़रता है फ़ितरतन, वो वक्त अभी ज़िन्दा है ...!!
Ati Sundar!! Apka blog yuhi chmakta rahe iske liye hardik shubechchha!!! Ishwariya prasad ka ek hissa hai ye soch!!
ReplyDeleteईश्वरीय है या नहीं यह तो नहीं जानता... लेकिन प्रसाद है इतना जानता हूँ। आपकी शुभेक्षाओं के लिए धन्यवाद सर ...
ReplyDeleteBohot jaandaar guru
ReplyDeleteMaja aa gaya sach me, aur thodi si aankhen bhi nam ho aayi
khair itnaa bhaavuk na kiya karo yaar, jaandaar likhte ho aap
Sir aapke blog ke bade charche sunne ko mil rahe hain
ReplyDeletewaise ye waalaa bhi bahut hi badhiya hai
khair aap likhe aur majedaar na ho ye kabhi ho sakta hai bhalaa.
Mai aapko yaad hu ya nahi Sir
Aapne mujhe Tution padhaya tha Allahabad me
पतझड़ की जुबाँ सीखी, बारिशों की कीमत पर,
ReplyDeleteक्या कहें इस पर सुमित जी, बस ऐसा लग रहा है जैसे कोई चाँदनी रात में अपना बिछड़ा गाँव याद कर रहा हो। सिर्फ अल्फ़ाज़ आपके हैं, दर्द हम सबका है। शुक्रिया इस सधी और सोंधी रचना के लिए।
मेरा आपसे एक अनुरोध यह है कि, एक-एक करके आप सभी उपनिषदों की सरल व्याख्या करते हुए कुछ लेखों की एक छोटी सी श्रंखला प्रकाशित करें तो अतिउत्तम हो। यह केवल एक सुझाव है वैसे आपकी किसी विधा से हमें कोई परहेज़ नहीं।
bhahut khoob dost
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