लक्ष्य, प्रयास, परीक्षण और परिणाम
शब्द नहीं ये
परिभाषा हैं ,
नित-नित गहराते तम में भी
बुझते प्रकाश की एक आशा हैं
;
दूर क्षितिज पर स्वप्न एक
जब थोडा धुंधला हो जाए,
जब रेखा भय की चुपके से
मन में कायरता भर जाए ;
जब लगे की सब निष्फल होगा
और अस्त्र-शस्त्र भी शेष न
हो,
अंत समय में मृत्यु निकट हो
और शत्रु से भी क्लेश न हो ;
तब रात्रि पूर्णिमा की हो यदि
और गंगा का तट निकट कहीं,
कोई अर्पण करता हो दीपक
हो घंटों का
अनुनाद वहीँ ;
क्षण भर रुक कर करना चिंतन
क्या इस जल में भी है जीवन ?
फिर भी तो पूजा जाता है !
श्रद्धा जग की ये
पाता है ,
क्यूंकि हे मेरे धरापुत्र
!!
उस जीवन का अर्थ ही क्या ?
जहाँ जीवटता, विश्वास न हो ,
मृत्यु से पहले
ही जैसे
जीवित प्राणी में श्वास न हो ;
हैं जीवन समर में अर्जुन
असंख्य !
हतबुद्धि खड़े ले
धनुष हाथ ;
प्रत्यंचा में कम्पन
ही नहीं
अब कृष्ण नहीं
हैं उनके साथ ,
सारा रण तूने जीत लिया !!
अब मौन खडा क्या सोच रहा ?
सब चढ़े बलि सिद्धांतों पर
स्वजनों के लिए क्या सोच
रहा ?
हे पार्थ मेरे ये धर्मयुद्ध
!!!!
तू शस्त्र उठा, तू भेद
लक्ष्य
कृष्ण तेरे अब ह्रदय में हैं ;
कौरव सेना अविजित तो क्या ?
कृष्ण तेरे अब ह्रदय में हैं ;
गंगा की कल कल ध्यान से सुन
!
रण का क्रंदन भी ध्यान से
सुन !
क्या कहा कृष्ण ने ध्यान से सुन !
है जो अंतर्मन में ध्यान से सुन !
सब एक बात, सब एक तथ्य
आधार एक और ए क तत्व ;
जो गूँज रहा आदि से अंत !!!
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचनः "
सुमित
सिंह दीक्षित
सुमित जी मनस्कार(नमस्कार नहीं) क्यूँकि ऐसे नवीन ऊर्जा से ओत-प्रोत चिठ्ठे के लेखक को हम पाठकों के मन को स्वीकार करना होगा। आपका चिठ्ठा और आप, दोनों ही बधाई के पात्र हैं। आपके लेख और कविताएँ देखकर यही लगता है कि शायद आप स्वयं निश्चय ना कर पा रहे हों कि आप गद्य लेखक हैं अथवा पद्य इसे लेकर अभी हम भी अनिश्चय की स्थिति में ही हैं। आपका दोनों ही पर इतना समान अधिकार है कि देखते ही बनता है। खैर ये तो समय ही बताएगा
ReplyDeleteऔर आपसे एक पाठक की विनती है कि किसी भी आर्थिक या अन्य किसी कारण से आपकी ये भाषा सेवा बंद नहीं होनी चाहिए ऐसे समय पर कृपापुर्वक आप हमें समस्या से अवगत कराएँगे ऐसी आपसे प्रार्थना तथा विश्वास है
Dr. Nalini Rai
Gorakhpur, U.P.
nalinirais@gmail.com
Mo-09838822800
मेरा भी "मनस्कार" लीजिएगा भईया जी। मैं नलिनी जी से पूरा इत्तफाक रखता हूँ। नलिनी जी आपने एकदम सही कहा की सुमित जी का दोनों पर समान अधिकार है और मैं तो कहूँगा की इन साहब को अपनी इस काबिल्यत का भरपूर उपयोग करना चाहिए और नलिनी जी हिन्दी का दान पुण्य सब अकेले मत कमा लीजिएगा ऐसा मौका आए तो हमसे भी बोलिएगा आप लोग
ReplyDeleteभगवान की कृपा आप सभी पर बनी रहे
आप दोनों ही सहृदय सुधि पाठकों का मनस्कार मुझे सहर्ष ही स्वीकार्य है। नलिनी जी बिना किसी लाग लपेट के ये बता दूं कि, इतनी जल्दी मेरा यह तकनीकी एवं अन्य कारणों से कमज़ोर चिट्ठा आप जैसे विद्व्जनों के बीच पहुँच जाएगा ऐसा मुझे कतई विश्वास नहीं था, और ना ही इस प्रयोजन हेतु मैं लिख रहा था फिर भी आपके इस सहज स्वीकार्य के लिए कोटिश: धन्यवाद ।
ReplyDeleteप्रथम तो अब ये चिट्ठा किसी भी हालत में बंद होने से रहा,क्यूँकि "हो पाप या की पुण्य, कुछ भी किया मैने नहीं, आधे हृदय से ........" और यदि कभी किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता पड़ी भी तो मुझे हिन्दी संसार के आगे हाथ पसारते हुए आनंद ही आएगा....
और पंडित जी आप निश्चिंत रहें ना तो इस तृणमात्र अकिंचन की काबिलियत बेकार जाएगी और ना ही आपको पुण्य कमाने के लिए मिलने वाला अवसर... बहुत बहुत धन्यवाद आपकी शुबेक्षाओं के लिए