जैसे-जैसे
आयु बढ़ती है, “वयस” घटती जाती है l वयस अर्थात कुल आयु l वयस तय होती है l सड़क
पर उड़ते किसी पीले मुर्दा पत्ते से लेकर, उसे कुचलकर जाते भीमकाय वाहन तक l
सड़कों के चक्रव्यूह में फँसे उस ड्राइवर से लेकर, दूर किसी “पुर,गंज या बाद” के
छोटे से घर की खिड़की से रस्ता निहारती उसकी पत्नी तक l हमें दीख पड़ने वाली हर
चीज़ अपनी वयस लेकर ही पैदा होती है l
ठीक वैसे ही लोगों के बीच
पैदा हुआ रिश्ता भी अपनी वयस से बंधा होता है l जैसे-जैसे सम्बंधों की आयु बढ़ती
है, इनकी वयस क्षीण होती जाती है l सम्बंधों में भुगता गया हर दिन,हर क्षण इसके
पैदा होने के साथ उपजी संभावनाओं को क्षीण करता जाता है l जैसे मुट्ठी से रेत
फिसलती जाती है और आप केवल विवश होकर इसे देख सकने के लिये स्वतंत्र होते हैं,
इससे अधिक कुछ नहीं l संभावनाओं का यही रीतते जाना वयस का समाप्त होना है l
इस पूरी प्रक्रिया में
मज़े की बात यह है कि, इस वयस को तय करने वाला कोई उपर बैठा ईश्वर या देव नहीं है
l इसे तय करते हैं हम स्वयं l अपनी आत्मा कि प्रकाशित क्षमता के आधार पर, अपनी
स्वयं कि उद्घृत शक्ति के आधार पर l
सृष्टि के सूक्ष्मतम कण
से लेकर विशालतम रूप तक जो भी जन्म चुका है, वो अपने साथ संभावना लाया है l सत्य
पाने कि संभावना l आत्मा के आलोकित होने कि संभावना l जो कि समापन के अंतिम क्षण
तक यूँ ही बनी रहती है, जैसे प्रारंभ के प्रथम क्षण में थी l कोई भी रिश्ता
इन्सानी या कुदरती, इसी संभावना के साथ शुरू होता है और अपनी कुल आयु अर्थात वयस
समाप्त होने तक इसी के इर्द गिर्द घूमता रहता है l
रिश्तों कि उम्र तेज़ी से
बढ़ती है, विशेषकर कुछ ख़ास रिश्तों की l शायद इन रिश्तों की आयु तथा वयस को ध्यान
में रखते हुए ही किसी शायर ने कहा था कि-
“इश्क की मंज़िल-औ-राहों
में है फ़र्क कहाँ,
ज़रा आहिस्ता चलो शेख़,
दूर तलक जाओगे ...”!!
यह नियम उतना ही
सार्वभौमिक है, जितना सूर्योदय का नियम l अब सोचने वाली बात यह है कि, “यदि
प्रत्येक कण,स्थिति-अवस्था इत्यादि कि वयस होती है, तो क्या दुख,क्लेश,संताप और
दुर्दिन की भी कुल आयु अर्थात वयस तय होती है ?...
इसका उत्तर आप स्वयं
सोचें, लेकिन याद रहे “अपनी
आत्मा कि प्रकाशित क्षमता के आधार पर, अपनी स्वयं कि उद्घृत शक्ति के आधार पर...”!!

bhai bahut shandar likhte ho aap...mai mobile par aapka blog visit karta rahta hu...bhaiya kya aap meri ek baat maanoge..
ReplyDeleteaap please thoda sa normal hindi ka use karo...kuch cheez meri bhi samajh me nahi aati...halanki meri hindi achhi hai bhaiya..
mai bhi kuch likhta hu...aise hi..kabhi aapko dikhana chahta hu..is it possible bhaiya?