वास्तव में अभिशापित होने
का सुख जीवन में कम ही लोगों को मिल पाता है l एक ऐसा अभिशाप जो तर्क और विचार की
जन्मजात सीमा से पार ले जा सके l जहाँ से पीड़ा के एक नये संसार का प्रारम्भ होता
हो l
“निराला” उन्हीं
सौभाग्यशाली लोगों में से एक थे l निराला को अभिशप्त होने का गौरव यूं ही नहीं
मिला l सुख की पाई-पाई चुका कर मोल लिया था उन्होने दुख l निराला ने निराला होने
के लिये क्या मूल्य चुकाया, यह केवल निराला ही जानते थे l मरघट की भस्म का तिलक
लगाकर जीवन का गान करना कितनों के लिये संभव है ? पिता होने का दंभ भरना और बात है
किन्तु “सरोज-स्मृति” लिखना केवल निराला के ही वश की बात थी l जीवन भर नंगे पैर
इलाहाबाद की सड़कों पर फक्कड़ी करके उन्होने सच ही वीणावादिनी को प्रसन्न
किया था तभी तो उन्हें सबसे भिन्न,सबसे अमूल्य वरदान मिला l अभिशाप का वरदान l

Aapne bhavuk kar diya Sumit ji. waise maine NIRALA ko lagbhag sampurn padha hai parantu ye jis kavita ka aapne upyog kiya hai mere padhne me nahi aayi.
ReplyDeleteaapke lekhan me shabdo ka jo sateek upyog hota hai wo nayi peedhi ke lekhako me samaapt sa ho chala hai. aap jaise naye lekhak ko hindi me dekhkar ashchary mishrit santosh hota hai.
dhanywaad.