Friday, 6 June 2014

इतिहास-बोध की विचित्र विडम्बना


यह आधुनिक युग की विचित्र विडम्बना मानी जाएगी कि एक तरफ आज का मनुष्य “इतिहास-बोध” से आक्रांत है,दूसरी तरफ मृत अतीत और काल्पनिक भविष्य के बीच स्वयं इतिहास की जीवंत धारा सूख गई है । जिस तरह नदी में डूबता मनुष्य पानी से कोई रिश्ता जोड़ने की सोच भी नहीं सकता, उसी तरह इतिहास में डूबता मनुष्य समय का मर्म नहीं जान सकता । वह इतिहास से संत्रस्त हो सकता है किन्तु उसे अपने जीवन और मृत्यु का साक्षी नहीं बना सकता। जहाँ एक तरफ  “वेदों की तरफ लौटो” का नारा देने वाले महर्षि दयानन्द सरस्वती तथा मनुष्य की समस्त नाम-अनाम समस्याओं का समाधान उपनिषदों में देखने वाले स्वामी विवेकानन्द की प्रासंगिकता को चुनौती देता यह प्रश्न है कि “वह इतिहास जो इस पृथ्वी पर मनुष्य का साक्षी न बन सके और जिसमें मानव अपने अस्तित्व को न तलाश सके उसका क्या अर्थ रह जाता है ?” वहीं दूसरी ओर आधुनिक भारत के महान वैज्ञानिक तथा पूर्व राष्ट्रपति डॉ.अब्दुल कलाम की भारत के नव-बुद्धिजीवियों से यह माँग कि “भारतीय परंपरा की सनातनता ही इसकी जीवन रेखा है इसलिए हमें शास्त्रों का प्रासंगिक तथा व्यवहारिक सरलीकरण करना ही होगा” न केवल एक सम-सामयिक किंकर्तव्यविमूढ़ता की झलक दिखाती है अपितु हम शोधार्थियों को संचार की ऐतिहासिकता एवं प्रासंगिकता में सम्यक तत्वों की खोज के लिए जीवट निमंत्रण देती है ।
आज इतिहास-बोध आधुनिक मनुष्य का ठूँठा अंधविश्वास बनकर रह गया है जिसके पास वह भविष्य का अर्थ टटोलने नहीं अपितु वर्तमान से छुटकारा पाने जाता है लेकिन प्रश्न यही है कि क्या हम वर्तमान से छुटकारा पा सकते हैं ? भविष्य किसी काल्पनिक “यूटोपिया” में स्थिर नहीं होता, वह वास्तव में मनुष्य के उन अवशेषों में रहता है जिसे हम कहते हैं- “स्मृति और स्वप्न”। “क्या पत्ते का भविष्य वृक्ष नहीं है,जो स्वयं पत्ते की मरी हुई स्मृति से विकसित हुआ है ?
यही कारण है कि आदिकाल से मनुष्य ने सदैव स्वयं से प्रश्न किया कि “क्या उसका इस धरती पर होना अपने आप में सम्पूर्ण है”? यदि गौतम बुद्ध बारह वर्ष समाधि में रहकर कोई सत्य या सत्य का दर्शन उपलब्ध कर पाये तो अवश्य ही वह दर्शन अपने आप में सम्पूर्ण रहा होगा । यदि ऐसा था तो उन्हें सारनाथ में चार आदमियों के सम्मुख अपना संदेश देने कि आवश्यकता क्यों अनुभव हुई ? क्या कहीं उनकी यह आत्मोलब्धि सम्पूर्ण होने पर भी आत्मशंकित या अप्रमाणित थी ? क्या ऐसा नहीं था कि आत्म के साथ उनके संचार से प्राप्त दर्शन केवल अपने संदेश में ही संपूर्ति पा सकता था ? क्या दूसरों का अंधेरा ही उनके आलोक कि कसौटी बना ?

यह सभी प्रश्न वास्तव में स्वयं में उत्तरित हैं, और इसका उत्तर संचार की एक नई अवधारणा सामने लाता है कि “संवाद हम दूसरों से करते तो हैं लेकिन – दूसरों के लिए नहीं करते – यह होता है स्वयं को पहचानने के लिए” । इसलिए संवाद आत्मा कि आवश्यकता है और यही कारण है कि संचार स्वार्थ और परमार्थ से ऊपर उठकर जीने कि अनिवार्य शर्त और मर्यादा बन जाता है । संचार जीव को उसकी सत्ता का आभास कराता है, चाहे वह अन्तरवैयक्तिक हो या अन्तःव्यक्तिक। क्योंकि मानव ने अपनी प्रकृतिप्रदत्त बुद्धि क्षमता के बल पर सर्वाधिक परिष्कृत संचार प्रणाली का विकास किया। अतः मानव के लिए संचार  प्रकृति की खोज का सहज साधन बन  गया ।

Monday, 3 March 2014

आखेटक शब्दों का...



एक समर्थ लेखक और एक सचेत शिकारी के बीच बहुत बारीक से अंतर के साथ, एक गहरी समानता होती है l लेखक के सामने भी मानव मन का, अंतर्रात्मा का घना जंगल होता है l सत्‍य के सूरज और आत्मा की ज़मीन को मिलने से रोकते हुए दैत्यकाय वट-वृक्षों से लेकर, कायरता का अँधेरा समेटे घने झुरमुटों का जंगल l बिल्कुल एक शिकारी की तरह दुनिया के बाकी गोरखधंधों से जानबूझकर बेख़बर लेखक के लिए जानने योग्य केवल एक ही रहस्य है, वो है जंगल l चेतन-अवचेतन की शिकारगाह l शिकारी की तरह कटिबद्ध होकर, अपने हथियार जाँचकर लेखक उतारता है इस जंगल में l तर्क, विचार और अनुभव के शष्त्र लेकर l शिकारी अपनी जान का दाँव लगाता है और लेखक अपने अस्तित्व का l दोनों के सामने पूरा जंगल अपना चुनौती भरा विस्मय लेकर खड़ा होता है l एक ऐसी दुनिया जो खुद के चलने पर चरमराते सूखे पत्तों से लेकर, डाल छोड़कर उड़े पंछी के पंखों की फड़फड़ाहट से हर क्षण चकित करती है l यही अवसर होता है जब शरीर का अंग-प्रत्यंग सजग,स्फूर्ति से भरा और ईमानदार हो जाता है l अनगिनत आँखों में तैरते असंख्य भावों से जंगल का हर जानवर आपकी हर चाल पर नजर रखे हुए होता है l सामान्य नियम तथा गति से चलते इस संसार में एक अजनबी को देखकर सभी प्राणी सुरक्षित जगह तलाशकर सिमट जाते हैं l जैसे लेखक को देखकर उसका अंतर उसे छलने लगता है l शिकारी और जंगल देर तक एक दूसरे की घात में, एक दूसरे को तौलते रहते हैं l जितने प्राणी उतनी साँसें, उतनी गंध l हर आहट, हर थिरकन पिछली वाली से पूरी तरह अलग l शिकारी लगभग हर गंध पहचानता है, ख़तरे की भी और अवसर की भी l लेखक की तरह ही शिकारी को जंगल के सन्नाटे की हर किस्म का पता होता है l उसे मौन के संवाद की कला पता है l यही “मिस्टिकल-सेन्स” शिकारी को शिकारी और लेखक को लेखक बनाती है l
फिर जैसे-जैसे शिकारी अंदर बढ़ता जाता है, उसकी दोनों आँखों के बीच बल पड़ता जाता है l उसे जंगल बारीक़ से सुराग देता रहता है, जिस पर उसकी जिंदगी उस क्षण टिकी होती है l फिर अचानक वो उन अनगिनत गंधों में से किसी एक गंध को पहचान लेता है l किसी एक थिरकन को भाँप जाता है l
बस्स्स... फिर उसके लिए बाकी जंगल का कोई मोल नहीं l
 हर विचार, हर भाव से निस्संग होकर सम्पूर्ण एकाग्र हो जाता है वो उसी एक पर l 
उसकी सभी इन्द्रियां उस एक के साथ एकाकार होकर उसका अनुमान कर लेती हैं l फिर धीरे धीरे प्रत्येक छोटे 
से छोटे प्रलोभनों को छोड़ते रहने के मूल्य में उन दोनों की निस्संगता पकती चली जाती है l शिकारी और 
लेखक दोनों उसी एक को जीने लगते हैं l क्षण प्रतिक्षण वो परकाया प्रवेश करते जाते हैं और अंत में उस एक 
गंध,एक थिरकन, एक आहट का साक्षात्कर कर पाते हैं, उसी के अपने शरीर में रहते हुए l उसकी अगली हर 
चाल और संभावित दिशा का पूर्वानुमान होने लगता है l
कौन किसको भगा रहा है? नहीं मालूम पड़ता, कौन किसके शिकार पर है? कह नहीं सकते l 

शिकार और शिकारी दोनों एक दूसरे का पूर्वानुमान लगाकर अगली चाल चलते हैं l फिर एक क्षण आता है जब शिकारी को उसका शिकार हाथ लग जाता है, कोई चाल कामयाब हो जाती है l उसके हाथ रक्त से सनी शिकार की देह छू सकते हैं l

यहीं लेखक का परिणाम कुछ और हो जाता है l उसका भाव, विचार या चरित्र पूरी तरह पुष्ट हो जाता है, और बदले में लेखक का पूर्वानुमान घायल हो जाता है, कभी कभी उसकी मृत्यु भी हो जाती है l लेखक को लगता है कि, अरे! यह तो वही है, जिसकी तलाश में, मैं इतनी दूर अंतर्मन की भूलभुलैया पार करके यहाँ तक पहुँचा हूँ l 
और फिर तभी उसे पता चलता है कि मुझे इसकी तलाश नहीं थी, इसे मेरी तलाश थी l शिकार और शिकारी यहाँ एक हो जाते हैं l अपनी सम्पूर्णता में एक l
और लेखक नोवालिस कि उस उक्ति के साथ वापस लौटता है कि, “हम सत्‍य नहीं पा सकते, केवल अपने भ्रमों के आईने से उसकी उपस्थिती का आभास पा सकते हैं l”

Monday, 24 February 2014

होना न होना



इतिहास के महानतम क्षणों में एक व्यक्ति का अँधेरा, दूसरे के आलोक की कसौटी बना l यह वास्तव में दोनों की आत्माओं का संघर्ष था l संघर्ष, स्वयं को पहचानने का l संघर्ष, सत्‍य से साक्षात्कार का l भगवान बुद्ध हो सकने के लिए राजकुमार सिद्धार्थ का होना उतना ही आवश्यक था, जितना महात्मा गाँधी होने के लिए मोहनदास करमचंद गाँधी का होना l “जरा और मृत्यु राजकुमार सिद्धार्थ ने देखी और इंसान-इंसान में भेद का अपमान मोहनदास करमचंद गाँधी ने झेला l जिस क्षण लोगों के भीतर व्याप्त दुख के अंधकार को इन दोनों ने अपने सुख के आलोक से मापा, उसी क्षण उपजी आत्मछलना की भावना ने मनुष्यत्व को एक नयी करवट, एक नया आयाम दिया l हमें भगवान बुद्ध और महात्मा गाँधी मिले l 


Friday, 21 February 2014

निराला जयन्ती पर...



वास्तव में अभिशापित होने का सुख जीवन में कम ही लोगों को मिल पाता है l एक ऐसा अभिशाप जो तर्क और विचार की जन्मजात सीमा से पार ले जा सके l जहाँ से पीड़ा के एक नये संसार का प्रारम्भ होता हो l
“निराला” उन्हीं सौभाग्यशाली लोगों में से एक थे l निराला को अभिशप्त होने का गौरव यूं ही नहीं मिला l सुख की पाई-पाई चुका कर मोल लिया था उन्होने दुख l निराला ने निराला होने के लिये क्या मूल्य चुकाया, यह केवल निराला ही जानते थे l मरघट की भस्म का तिलक लगाकर जीवन का गान करना कितनों के लिये संभव है ? पिता होने का दंभ भरना और बात है किन्तु “सरोज-स्मृति” लिखना केवल निराला के ही वश की बात थी l जीवन भर नंगे पैर  इलाहाबाद की सड़कों पर फक्कड़ी करके उन्होने सच ही वीणावादिनी को प्रसन्न किया था तभी तो उन्हें सबसे भिन्‍न,सबसे अमूल्य वरदान मिला l अभिशाप का वरदान l


Thursday, 20 February 2014

मुठ्ठी से फिसलती रेत...




जैसे-जैसे आयु बढ़ती है, “वयस” घटती जाती है l वयस अर्थात कुल आयु l वयस तय होती है l सड़क पर उड़ते किसी पीले मुर्दा पत्ते से लेकर, उसे कुचलकर जाते भीमकाय वाहन तक l सड़कों के चक्रव्यूह में फँसे उस ड्राइवर से लेकर, दूर किसी “पुर,गंज या बाद” के छोटे से घर की खिड़की से रस्ता निहारती उसकी पत्नी तक l हमें दीख पड़ने वाली हर चीज़ अपनी वयस लेकर ही पैदा होती है l
ठीक वैसे ही लोगों के बीच पैदा हुआ रिश्ता भी अपनी वयस से बंधा होता है l जैसे-जैसे सम्बंधों की आयु बढ़ती है, इनकी वयस क्षीण होती जाती है l सम्बंधों में भुगता गया हर दिन,हर क्षण इसके पैदा होने के साथ उपजी संभावनाओं को क्षीण करता जाता है l जैसे मुट्ठी से रेत फिसलती जाती है और आप केवल विवश होकर इसे देख सकने के लिये स्वतंत्र होते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं l संभावनाओं का यही रीतते जाना वयस का समाप्त होना है l 
इस पूरी प्रक्रिया में मज़े की बात यह है कि, इस वयस को तय करने वाला कोई उपर बैठा ईश्वर या देव नहीं है l इसे तय करते हैं हम स्वयं l अपनी आत्मा कि प्रकाशित क्षमता के आधार पर, अपनी स्वयं कि उद्घृत शक्ति के आधार पर l
सृष्टि के सूक्ष्मतम कण से लेकर विशालतम रूप तक जो भी जन्म चुका है, वो अपने साथ संभावना लाया है l सत्‍य पाने कि संभावना l आत्मा के आलोकित होने कि संभावना l जो कि समापन के अंतिम क्षण तक यूँ ही बनी रहती है, जैसे प्रारंभ के प्रथम क्षण में थी l कोई भी रिश्ता इन्सानी या कुदरती, इसी संभावना के साथ शुरू होता है और अपनी कुल आयु अर्थात वयस समाप्त होने तक इसी के इर्द गिर्द घूमता रहता है l
रिश्तों कि उम्र तेज़ी से बढ़ती है, विशेषकर कुछ ख़ास रिश्तों की l शायद इन रिश्तों की आयु तथा वयस को ध्यान में रखते हुए ही किसी शायर ने कहा था कि-
“इश्क की मंज़िल-औ-राहों में है फ़र्क कहाँ, 
ज़रा आहिस्ता चलो शेख़, दूर तलक जाओगे ...”!!
यह नियम उतना ही सार्वभौमिक है, जितना सूर्योदय का नियम l अब सोचने वाली बात यह है कि, “यदि प्रत्येक कण,स्थिति-अवस्था इत्यादि कि वयस होती है, तो क्या दुख,क्लेश,संताप और दुर्दिन की भी कुल आयु अर्थात वयस तय होती है ?...
इसका उत्तर आप स्वयं सोचें, लेकिन याद रहे “अपनी आत्मा कि प्रकाशित क्षमता के आधार पर, अपनी स्वयं कि उद्घृत शक्ति के आधार पर...”!!


Wednesday, 19 February 2014

दूरदर्शन के लिए लिखा गया गीत...




(बदरा कब तक भागेगा, आज ठहर मोरे देस
नैनन  में  पानी लिए,  कोई निरखे मेघ ) !! (starting from alaap)

प्यासी थी कल तक धरती, था गुमसुम आसमाँ
बंजर थे ख़्वाब सारे,  फिरते थे  यहाँ-वहाँ ; -4
थी ख़ुशियों से आँखमिचोली, ख़ुशियाँ हाथ ना आईं
साये सी थीं साथ हमारे, पर ढ़ूँढा कहाँ-कहाँ ; -3
(रंग कहाँ पानी का कोई, फिर भी रंग हैं सारे
जाने  कैसे बन  जाते हैं,  रिश्ते  मीठे-खारे) –2 (connecting repeat)

(अँसुअन पानी, बिरहन पानी, बैरन पानी रे...
तनमन पानी, दरपन पानी, जोगन पानी रे...) !! -1 (second alaap :with connecting last rythm)

कोशिश जीती, अड़चन हारी, किस्मत मेहरबाँ
लहराते पानी पर हमनें लिख दी है दास्ताँ ; +4
अन्धियारों की चट्टानों से राह निकलती तो है
मिट्टी गाती झूम रही, अब हर मुश्किल आसाँ ; +3
(रंग कहाँ पानी का कोई, फिर भी रंग हैं सारे
जाने  कैसे बन  जाते हैं, रिश्ते  मीठे-खारे) +2 (connecting repeat)

(बरसन पानी, दरसन पानी, सब जन पानी रे...
माँगन पानी, बाँटन पानी, सब धन पानी रे...) +1 (Last alaap with same repeat rythm)

- This SHORT SONG written by me for DOORDARSHAN NATIONAL on Water.


मिस्टिकल सेंस




कभी-कभी अकेलापन भ्रम पैदा करता है l अकेले होने का भ्रम l दुनियावी चीज़ों से अलग रह पाने का भ्रम l बिना किसी संघर्ष के भूख,इज़्जत और सुरक्षा के मानी पूरे होते रहने का भ्रम l ऐसा महसूस होने लगता है कि कुछ बलिदान करके आप सत्य कि ओर बढ़ रहे हैं l वही आत्मा का सत्य, जिसे पाने के लिये हमने हाड़ कँपा देने वाली सर्द रात में एक झीनी सी धोती से अपने नवजात को ढँके सड़क किनारे पड़ी माँ के बिल्कुल नंगे सत्य से आँखे घुमा लीं l 
कितने ऐसे सत्य कि तलाश में आगे गये,कितने और जायेंगे पता नहीं l 
लेकिन इतना तय है कि नींद बेचकर ख़्वाब ख़रीदने का सिलसिला चलता रहेगा l ऐसा एकान्त निश्चित ही रचनात्मक होता है लेकिन क्रियात्मकता के मूल्य पर कतई स्वीकार नहीं है l
जिम कार्बेट अपनी पुस्तक में एक जगह शिकारी के “मिस्टीकल सेन्स” के बारे में लिखते हैं कि कैसे उस शांत लगने वाले जंगल में छिपी हज़ारों आँखों कि टोह शिकारी को मिल जाती है l
ठीक वैसे ही बार-बार यह भ्रम होता है कि, जैसे यह चुप्पी,यह सन्नाटा,यह शांति एक धोखा है l एक छलावा l सुनसान जंगल का एक ऐसा मायाजाल, जिसके पीछे अनगिनत जीव और प्राणी हमारी प्रत्येक मुद्रा, भाव-भंगिमा और हरकत को देख रहे हैं l जबकि हमें चारों ओर स्तब्ध सा सन्नाटा महसूस होता है l एक पूरी कि पूरी आगत पीढ़ी हमारी ओर देख रही है और हम प्रेम और सुंदरता के गीत गा रहे हैं ... !!!