Monday, 24 February 2014

होना न होना



इतिहास के महानतम क्षणों में एक व्यक्ति का अँधेरा, दूसरे के आलोक की कसौटी बना l यह वास्तव में दोनों की आत्माओं का संघर्ष था l संघर्ष, स्वयं को पहचानने का l संघर्ष, सत्‍य से साक्षात्कार का l भगवान बुद्ध हो सकने के लिए राजकुमार सिद्धार्थ का होना उतना ही आवश्यक था, जितना महात्मा गाँधी होने के लिए मोहनदास करमचंद गाँधी का होना l “जरा और मृत्यु राजकुमार सिद्धार्थ ने देखी और इंसान-इंसान में भेद का अपमान मोहनदास करमचंद गाँधी ने झेला l जिस क्षण लोगों के भीतर व्याप्त दुख के अंधकार को इन दोनों ने अपने सुख के आलोक से मापा, उसी क्षण उपजी आत्मछलना की भावना ने मनुष्यत्व को एक नयी करवट, एक नया आयाम दिया l हमें भगवान बुद्ध और महात्मा गाँधी मिले l 


Friday, 21 February 2014

निराला जयन्ती पर...



वास्तव में अभिशापित होने का सुख जीवन में कम ही लोगों को मिल पाता है l एक ऐसा अभिशाप जो तर्क और विचार की जन्मजात सीमा से पार ले जा सके l जहाँ से पीड़ा के एक नये संसार का प्रारम्भ होता हो l
“निराला” उन्हीं सौभाग्यशाली लोगों में से एक थे l निराला को अभिशप्त होने का गौरव यूं ही नहीं मिला l सुख की पाई-पाई चुका कर मोल लिया था उन्होने दुख l निराला ने निराला होने के लिये क्या मूल्य चुकाया, यह केवल निराला ही जानते थे l मरघट की भस्म का तिलक लगाकर जीवन का गान करना कितनों के लिये संभव है ? पिता होने का दंभ भरना और बात है किन्तु “सरोज-स्मृति” लिखना केवल निराला के ही वश की बात थी l जीवन भर नंगे पैर  इलाहाबाद की सड़कों पर फक्कड़ी करके उन्होने सच ही वीणावादिनी को प्रसन्न किया था तभी तो उन्हें सबसे भिन्‍न,सबसे अमूल्य वरदान मिला l अभिशाप का वरदान l


Thursday, 20 February 2014

मुठ्ठी से फिसलती रेत...




जैसे-जैसे आयु बढ़ती है, “वयस” घटती जाती है l वयस अर्थात कुल आयु l वयस तय होती है l सड़क पर उड़ते किसी पीले मुर्दा पत्ते से लेकर, उसे कुचलकर जाते भीमकाय वाहन तक l सड़कों के चक्रव्यूह में फँसे उस ड्राइवर से लेकर, दूर किसी “पुर,गंज या बाद” के छोटे से घर की खिड़की से रस्ता निहारती उसकी पत्नी तक l हमें दीख पड़ने वाली हर चीज़ अपनी वयस लेकर ही पैदा होती है l
ठीक वैसे ही लोगों के बीच पैदा हुआ रिश्ता भी अपनी वयस से बंधा होता है l जैसे-जैसे सम्बंधों की आयु बढ़ती है, इनकी वयस क्षीण होती जाती है l सम्बंधों में भुगता गया हर दिन,हर क्षण इसके पैदा होने के साथ उपजी संभावनाओं को क्षीण करता जाता है l जैसे मुट्ठी से रेत फिसलती जाती है और आप केवल विवश होकर इसे देख सकने के लिये स्वतंत्र होते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं l संभावनाओं का यही रीतते जाना वयस का समाप्त होना है l 
इस पूरी प्रक्रिया में मज़े की बात यह है कि, इस वयस को तय करने वाला कोई उपर बैठा ईश्वर या देव नहीं है l इसे तय करते हैं हम स्वयं l अपनी आत्मा कि प्रकाशित क्षमता के आधार पर, अपनी स्वयं कि उद्घृत शक्ति के आधार पर l
सृष्टि के सूक्ष्मतम कण से लेकर विशालतम रूप तक जो भी जन्म चुका है, वो अपने साथ संभावना लाया है l सत्‍य पाने कि संभावना l आत्मा के आलोकित होने कि संभावना l जो कि समापन के अंतिम क्षण तक यूँ ही बनी रहती है, जैसे प्रारंभ के प्रथम क्षण में थी l कोई भी रिश्ता इन्सानी या कुदरती, इसी संभावना के साथ शुरू होता है और अपनी कुल आयु अर्थात वयस समाप्त होने तक इसी के इर्द गिर्द घूमता रहता है l
रिश्तों कि उम्र तेज़ी से बढ़ती है, विशेषकर कुछ ख़ास रिश्तों की l शायद इन रिश्तों की आयु तथा वयस को ध्यान में रखते हुए ही किसी शायर ने कहा था कि-
“इश्क की मंज़िल-औ-राहों में है फ़र्क कहाँ, 
ज़रा आहिस्ता चलो शेख़, दूर तलक जाओगे ...”!!
यह नियम उतना ही सार्वभौमिक है, जितना सूर्योदय का नियम l अब सोचने वाली बात यह है कि, “यदि प्रत्येक कण,स्थिति-अवस्था इत्यादि कि वयस होती है, तो क्या दुख,क्लेश,संताप और दुर्दिन की भी कुल आयु अर्थात वयस तय होती है ?...
इसका उत्तर आप स्वयं सोचें, लेकिन याद रहे “अपनी आत्मा कि प्रकाशित क्षमता के आधार पर, अपनी स्वयं कि उद्घृत शक्ति के आधार पर...”!!


Wednesday, 19 February 2014

दूरदर्शन के लिए लिखा गया गीत...




(बदरा कब तक भागेगा, आज ठहर मोरे देस
नैनन  में  पानी लिए,  कोई निरखे मेघ ) !! (starting from alaap)

प्यासी थी कल तक धरती, था गुमसुम आसमाँ
बंजर थे ख़्वाब सारे,  फिरते थे  यहाँ-वहाँ ; -4
थी ख़ुशियों से आँखमिचोली, ख़ुशियाँ हाथ ना आईं
साये सी थीं साथ हमारे, पर ढ़ूँढा कहाँ-कहाँ ; -3
(रंग कहाँ पानी का कोई, फिर भी रंग हैं सारे
जाने  कैसे बन  जाते हैं,  रिश्ते  मीठे-खारे) –2 (connecting repeat)

(अँसुअन पानी, बिरहन पानी, बैरन पानी रे...
तनमन पानी, दरपन पानी, जोगन पानी रे...) !! -1 (second alaap :with connecting last rythm)

कोशिश जीती, अड़चन हारी, किस्मत मेहरबाँ
लहराते पानी पर हमनें लिख दी है दास्ताँ ; +4
अन्धियारों की चट्टानों से राह निकलती तो है
मिट्टी गाती झूम रही, अब हर मुश्किल आसाँ ; +3
(रंग कहाँ पानी का कोई, फिर भी रंग हैं सारे
जाने  कैसे बन  जाते हैं, रिश्ते  मीठे-खारे) +2 (connecting repeat)

(बरसन पानी, दरसन पानी, सब जन पानी रे...
माँगन पानी, बाँटन पानी, सब धन पानी रे...) +1 (Last alaap with same repeat rythm)

- This SHORT SONG written by me for DOORDARSHAN NATIONAL on Water.


मिस्टिकल सेंस




कभी-कभी अकेलापन भ्रम पैदा करता है l अकेले होने का भ्रम l दुनियावी चीज़ों से अलग रह पाने का भ्रम l बिना किसी संघर्ष के भूख,इज़्जत और सुरक्षा के मानी पूरे होते रहने का भ्रम l ऐसा महसूस होने लगता है कि कुछ बलिदान करके आप सत्य कि ओर बढ़ रहे हैं l वही आत्मा का सत्य, जिसे पाने के लिये हमने हाड़ कँपा देने वाली सर्द रात में एक झीनी सी धोती से अपने नवजात को ढँके सड़क किनारे पड़ी माँ के बिल्कुल नंगे सत्य से आँखे घुमा लीं l 
कितने ऐसे सत्य कि तलाश में आगे गये,कितने और जायेंगे पता नहीं l 
लेकिन इतना तय है कि नींद बेचकर ख़्वाब ख़रीदने का सिलसिला चलता रहेगा l ऐसा एकान्त निश्चित ही रचनात्मक होता है लेकिन क्रियात्मकता के मूल्य पर कतई स्वीकार नहीं है l
जिम कार्बेट अपनी पुस्तक में एक जगह शिकारी के “मिस्टीकल सेन्स” के बारे में लिखते हैं कि कैसे उस शांत लगने वाले जंगल में छिपी हज़ारों आँखों कि टोह शिकारी को मिल जाती है l
ठीक वैसे ही बार-बार यह भ्रम होता है कि, जैसे यह चुप्पी,यह सन्नाटा,यह शांति एक धोखा है l एक छलावा l सुनसान जंगल का एक ऐसा मायाजाल, जिसके पीछे अनगिनत जीव और प्राणी हमारी प्रत्येक मुद्रा, भाव-भंगिमा और हरकत को देख रहे हैं l जबकि हमें चारों ओर स्तब्ध सा सन्नाटा महसूस होता है l एक पूरी कि पूरी आगत पीढ़ी हमारी ओर देख रही है और हम प्रेम और सुंदरता के गीत गा रहे हैं ... !!!