15 अक्टूबर, आज के ही दिन इलाहाबाद के दारागंज मोहल्ले में राय साहब की कोठी के एक छोटे से कमरे में "सूर्यकांत त्रिपाठी" नामक एक ख्यातनाम कवि दवाइयों के अभाव में काल का ग्रास हुआ l हम सभी उनके उपनाम "निराला" से परिचित हैं l जीवन भर ये व्यक्ति नंगे पाँव रहा ! पैसों के अभाव में इनकी बेटी सरोज ने इन्ही की गोद में दम तोड़ दिया l कभी समय मिले तो "सरोज स्मृति" पढ़िएगा ! एक एक शब्द जैसे ह्रदय में कील ठोंकता है ! फिर भी निराला गुलाब को लताड़ने में हिचकिचाए नहीं ! "कुकुरमुत्ता" में लिखते हैं "अबे सुन बे गुलाब ........भूल मत जो पाई खुशबू, रंगोआब,....... खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,...... डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट;..........बहुतों को तूने बनाया है गुलाम,.....माली कर रक्खा, खिलाया जाडा घाम;" !!!
हमें कोई अधिकार नहीं कि हम निराला के नाम का पुरस्कार, छात्रवृत्ति, डाकटिकट आदि जगहों पर उपयोग करें ........हम ऋणी हैं इस महात्मा के ....और साहित्य कि शिराओं में प्रवाहित रक्त कि अंतिम बूँद भी इस ऋण का एकांश नहीं चुका सकती !!!
ऐसी उत्कट जिजीविषा और उत्साह को शत शत नमन .....अस्तु ! उसी राय साहब कि हवेली में मैंने दसवीं के लिए ट्यूशन पढ़ा है ...और तब भी बार बार इनके होने का आभास मुझे उन्मादित कर जाता था !
हमें कोई अधिकार नहीं कि हम निराला के नाम का पुरस्कार, छात्रवृत्ति, डाकटिकट आदि जगहों पर उपयोग करें ........हम ऋणी हैं इस महात्मा के ....और साहित्य कि शिराओं में प्रवाहित रक्त कि अंतिम बूँद भी इस ऋण का एकांश नहीं चुका सकती !!!
ऐसी उत्कट जिजीविषा और उत्साह को शत शत नमन .....अस्तु ! उसी राय साहब कि हवेली में मैंने दसवीं के लिए ट्यूशन पढ़ा है ...और तब भी बार बार इनके होने का आभास मुझे उन्मादित कर जाता था !

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