आज “विश्व धरोहर दिवस” है...
Mayank भईया, Vikas भाई, Armendra Amar भईया @Gaurav shukl, Gaurav भईया Vikas Gaur भाई और Sundaram Ojha ...ये सभी देश के विभिन्न हिस्सों से आए अलग-अलग चेहरे हैं। ऊपरी तौर पर किसी में कोई समानता नहीं लेकिन नज़र ज़रा सी पैनी कीजिए तो सबमें एक समानता है, और वो यह है कि “ये सभी शापित हैं”। इन सबको शाप मिला है कल्पना करने का, अनुभव करने का, ख़ुद के ख़िलाफ ख़ुद को मशविरा देने का। इन्हें शाप मिला है हर सड़क, हर गली और हर चौराहे की ख़ाक छानने का। ये बेबस हैं भूखी बस्तियों की भरी-पूरी संरचनाओं का जायज़ा लेने को या भीड़ से सूने गोल चक्करों की तरफ़ भटकने को। इन्हें शाप में ही तो मिली है भूख के ख़िलाफ भूखे बाज़ की शिद्दत और तबीयत में पानी सी बेरंगियत। ये जानते हैं कि, आदमी को जानवर बनाए बिना उससे जानवर सा काम लेना नामुमक़िन है और इसीलिए इनमें ताकत है इनकार करने की। ये इनकार करते हैं ख़ुद को जानवर बनाए जाने की हर साजिश के ख़िलाफ़, सिर उठाकर।
इन सभी में काबिलियत है आने वाली पीढ़ी का “स्वस्थ आदर्श” बनने की। ये सियाह रातों के जुगनू और काग़ज़ के कारिन्दे हैं। इन्हें सहेजना और संजोना हमारा काम है। इनका निश्छल विश्वास बचाना हमारा धर्म है। ये सभी शापित जुगनू हमारे दरकते मकानों की धरोहर और फिर उठ खड़े होने का यक़ीन हैं। य़ही हमारा वरदान और कल हैं।
गौरव शुक्ल की यह रचना इन सभी शापितों को समर्पित ...

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