Tuesday, 23 April 2013

जिनका "वाद" और "पन्थ" उनकी दाढ़ी,कुर्ते,झोले-झण्डे में रहता है, उनके वास्ते-

जब अन्तर न रह जाए
कविता करने और साबुन से नहाने में,
जब एक ही बात हो
टीस सहने और घाव दिखाने में,
जब भूख मिटने लगे
रोटी देखने और कागज खाने में;

बस तभी,
कल्लू बनिये की दुकान के पिछवाड़े
चुपके से रात में हो जाती है क्रान्ति !
लंगड़ा पिल्ला कुकुआता है रात भर
लहू सा जब सूखता है लाल अँधेरा ;
सुबह बिछड़ जाते हैं पूँजी के दोराहे पर
राज्य और क्रान्ति, खुशी-खुशी गले मिलकर,
दिन भर, दुरदुराहट की चिंगारियाँ
समेटेगा वो, कुर्ते की फटी जेबों में
रात में फिर होनी है वही क्रान्ति !!

वो बूढ़े दरख्त का, जवान पत्ता है
हवाओं के साथ भटकता है दर-ब-दर;
शाख के छोड़ने या छूट जाने के बाद !!

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