हम रोगी हैं, ये आप मत बताइए l हम पीड़ित हैं, ये भी मत बताइए l हम गये गुज़रे हैं, ये भी मत बताइए l ये सच यहाँ हर किसी को पता है l अगर बता सकते हैं तो हमें ये बताइए की हमारी शिराओं में बुद्ध, रामानुज, शंकराचार्य, विवेकानंद, अरबिंदो, गाँधी, सुभाष, तिलक और आज़ाद जैसे हाड़-माँस के भारतीपुत्रों का सिंहनाद करता रक्त अब भी क्यूँ प्रवाहित हो रहा है ? जो एक क्षण के लिए भी ये भूलने नहीं देता की हम "कौन" हैं !! बताइए, कर सकते हैं ये ? किसी को सिखा सकते हैं, क़ि रोग की "चिंता" ना करके, स्वास्थ्य का "चिंतन" कैसे किया जाए ? यदि नहीं तो अपनी बुद्धिजीविता सुलगाकर औरों की तरह दो वक़्त की रोटी सेंकिए l "भारत" जानता है कि उसे क्या करना है l


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