Tuesday, 23 April 2013

भोर के तारे सी अविचल मैं,
"निहारिका" सी हूँ अनंत ;
चन्द्रकिरण सी हूँ "विनम्र"
मेरे स्वप्नों का कहाँ अंत !!

मुझे मिला जीवन कण-कण में,
बिखरे हैं जो अधिकाँश यहीं ;
मानव लिखता है स्वयं भाग्य,
है सृष्टि का सारांश यही ....
है सृष्टि का सारांश यही .......!!!!
 

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