एक कलमकार ने स्याह रात की स्याही घोली ...और एक गीत लिखा ...गीत का मेहनताना 300 रु तय हुआ था और पूरी फिल्म का 1500 रु ...जो आज भी बकाया है ... गीत आज लाखों लोगो की मोबाइल धुन है और हज़ारों स्कूलों की प्रातः प्रार्थना...कई लोग इसी गीत से दिन की शुरुआत करते हैं ...गीत था 1986 में "एन चंद्रा" निर्देशित "अंकुश " फिल्म का ...."इतनी शक्ति हमें देना दाता , मन का विश्वास कमजोर हो न ..." ...और चित्र में हैं गीत लिखने वाले गीतकार "अभिलाष" ...स्थिति निराशाजनक है ...अपनी आँखों में आते पानी को छुपाकर , वही लेखकीय मुस्कान लाते हुए कहते हैं ..."बेटा ...कहीं शॉल,श्रीफल.स्मृतिचिन्ह से पेट की आग बुझती है ??? "...और अपने आशीर्वाद के साथ छोड़ जाते हैं एक जलता हुआ प्रश्न ....उन लोगों के लिए जो "शीला की जवानी" सुनकर अपना सर धुनते हैं...और अच्छे गीतकारों की कमी पर नुक्कड़ और बसों में अन्धाधुंद बहस करते हैं ....क्या वो और ये मायानगरी वाकई में ऐसे गीतकारों के लायक हैं ?? जिनके गीत वक़्त के साथ जवान होते जाते हैं ...है जवाब किसी के पास ???!!!


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