कौन कहता है कि,ज़िन्दग़ी छोटी है ? कतई नहीं। हम इसे संभावनाओं की कसौटी पर नाप सकते हैं। यक़ीन मानिए, अगर आपमें “अपने होने की वजह को” आख़िरी बूँद तक निचोड़ सकने का जज्बा है, तो हर दिन के बाद आने वाली रात को आप ख़ामोशी से गुनगुनाकर, आरामकुर्सी पर बादलों वाले चाँद को निहारते हुए वैसे ही आदतन बिता सकते हैं जैसे चावल में कंकड़ मिलाने वाला सेठ। शर्त केवल इतनी ही है कि, “मैं या कि देश”? यह प्रश्न हर साँस के साथ हममें ज़िन्दा है कि नहीं?... आख़िर जिस सोने के कँगूरे पर हमें नाज़ है, उसकी नींव में खुद की मरज़ी से झोंकी गईं अनगिनत ईंटों को जवाब देना है कि नहीं !!!
Manikant Suman भाई की इन पंक्तियों की बिजली आप भी महसूस कीजिए..

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