Tuesday, 23 April 2013

ये शेर वाकई में मेरे नहीं ...विलायत जा चुके उस लड़के की माँ के हैं , जो आज भी उम्मीद की शमाँ जलाए बैठी है ...पाँव से लाचार है, मगर हर रात बेटे के पास चली जाती है ख़्वाबों में ...मैंने सिर्फ अल्फाज दिए हैं ...ये मक्ता आज भी हूबहू उस माँ की आँखों में है !!! और जब इसे उस माँ ने सुना तो भरे गले और भीगी आँखों से आसमान के पार देखने लगी ...जैसे उसका बेटा भूख लगने पे पुकार रहा हो ...

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