Tuesday, 23 April 2013

मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी निर्मम है। वह सभ्यता और संस्क्रति के सभी मोहों को रौँदती चली आ रही है। सब कुछ में मिलावट है, सब कुछ अविशुद्ध है। यदि आज भी कुछ विशुद्ध है, तो वह है मनुष्य की दुर्दम इच्छाशक्ति। इसी इच्छाशक्ति ने न जाने कितने धर्माचारों, विश्वासों, उत्सवों और व्रतों को जन्म दिया, पल्लवित किया और क्षण भर में धूल धुसरित कर दिया। इस इच्छाशक्ति को "मुँशी जी" की कलम में देखा जा सकता है। "गोदान" इसका साक्षात उदाहरण है।

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