Tuesday, 23 April 2013

फुसलाते हैं ,
बसंती हवा के झोंके और छाँव :
मगर, धूप में तपता पेड़ 
और मजदूर के माथे का पसीना ;
चीखते हैं ,
रुकना मत, झुकना मत !!

बहलाते हैं ,
नीला समंदर और पूरनमासी का चाँद ;
मगर, रोटी के लिए बिलखता बच्चा
और पानी में पत्थर उबालती माँ :
गिडगिडाते हैं ,
रुकना मत, झुकना मत !!! 

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