भारत पाकिस्तान बँटवारे के दुर्दिन थे जब एक बच्चे के माता-पिता की हत्या उसी की आँखों के सामने की गयी l किसी तरह जान बचाकर बच्चा उत्तर प्रदेश में अपने मामा के यहाँ बनारस पहुँचा l और अपने किशोरवय से ही "हिन्दी" के सहज प्रेम में पड़ गया l वो हिन्दी ज़बान का ना होते हुए भी उसकी वंदना अपनी लेखनी से करने लगा l आज वो बच्चा हिन्दी का लाड़ला बन चुका है l अभी अपने जीवन के ८० वर्ष होम करके हिन्दी शब्दकोष के जीवंत एवं सशक्त हस्ताक्षर बन चुके काशीरत्न डाक्टर "बदरीनाथ कपूर" को "भाषारत्न" की उपाधि से अलंकृत किया गया l दर्जनों अभूतपूर्व हिन्दी कोष लिखकर जापान तक हिन्दी का विजयरथ ले जाने वाले हिन्दी के इस सुपुत्र को अभी भी अर्थाभाव के कारण घंटों काम करना पड़ता है l बिना माँगे हिन्दी को अपना जीवन समर्पित करने वाले इस भारतभारती को भी प्रकाशकों के मायाजाल में उलझ के रह जाना पड़ा l जितनी निश्च्छलता और प्रेम से किसी भी हिन्दी के नवागंतुक से कपूर साहब मिलते हैं कोई बिरला ही मिलेगा l इस बार मिलकर प्रसन्न हुए और कुछ कुछ निश्चिंत भी l हम जैसे लोग इनकी निश्चिंतता का कारण बने इतनी ना तो सामर्थ्य है और ना ही जीवटता ; फिर भी भेंटस्वरूप अपनी दस वर्षों तक उपयोग की हुई पुस्तक सहर्ष दी l कपूर साहब भले ही गुमनाम अंधेरो में साँस ले रहे हों मगर हिंदीभाषियों को यह स्मरण रखना होगा की यदि हिन्दी आज भी ससम्मान भारतवर्ष की हृदयंगिनी है तो इस महाकार भवन की नींव में बदरीनाथ कपूर जैसे महान वरदपुत्रों की झुलसी हुई इंटें हैं, जो इसे चिरकाल तक महागाथा बनाए रखेंगी l जय हिंद, जय हिन्दी l


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