Tuesday, 23 April 2013

स्वामी विवेकानंद की १५०वीं जयंती पर-
जब संपूर्ण विश्व का यश-वैभव स्वामी विवेकानंद के चरणों पर लोट रहा था, तब उन्हें अपनी माँ भुवनेश्वरी देवी के लिए गंगा किनारे "एक छोटी सी कुटिया" भी बनवा ना पाने की असमर्थता कचोट रही थी l जगत कल्याण के लिए सन्यासी जीवन अपनाकर स्वयं अपना श्राद्ध कर चुके स्वामी जी अपनी मृत्यु के दो दिन पूर्व तक माँ की व्यवस्था के लिए चिंतित रहे l मात्र ३९ वर्ष की अल्पायु में जब उन्होने महासमाधि ली तब उनकी माता की आयु ६१ वर्ष थी l अपनी माँ के लिए एक छोटा सा मकान बनाने का स्वप्न अंततः अपूर्ण ही रह गया l ऐसी त्यागमूर्ति को जब प्रत्येक युवा का आदर्श होना चाहिए तब बाहरी वैचारिक और व्यावहारिक दिखावे को अपना आदर्श बनाते युवाओं के दुर्भाग्य पर समय भी मौन है l निश्चित ही स्वामी विवेकानंद की आत्मा आज भी "फौलादी रक्त" वाले उन सौ युवाओं की बाट जोह रही होगी जिनसे भारत का उद्धार होना था l
 

1 comment:

  1. आवारा मजदूर नाम कुछ जंच नहीं रहा है... आवारा बंजारा या आवारा यायावर कहना ज्यादा सही होगा...

    ReplyDelete